मुक्तक/दोहा

औरँगजेबी सोच

फिर से उठने लग गए, बाबर वाले पाँव।
औरँगजेबी सोच से, सहमा सारा गाँव॥

नफरत लेकर घूमते, चेहरे बने महान।
प्रेम-सद्भाव भूलकर, करें देश अपमान॥

बस मजहब के नाम पर, बढ़ता रोज विवाद।
इंसानों के बीच में, बचा नहीं संवाद॥

फिर से कुछ चेहरे मिले, लेकर वही विचार।
बीते युग की भूल का, जो करते व्यापार॥

इतिहासों के वाद से, सीखो सच्ची बात।
नफरत का परिणाम है, दुख, हिंसा और घात॥

फूट डालकर राज की, चाल पुरानी जान।
जनता जब है जागती, टूटे हर अभिमान॥

नफरत के बाजार में, बिकते झूठ हजार।
सच की छोटी बात भी, करती गहरा वार॥

मंदिर हो या मस्जिदें, सबका अपना मान।
मिल-जुलकर रहने जुड़ी, भारत की पहचान॥

बाबर की तलवार से, औरँगजेबी चाल।
आज अगर फिर लौटती, बिगड़ें फिर से हाल॥

सत्ता के गलियार में, मत बाँटो इंसान।
जनता का विश्वास ही, लोकतंत्र की जान॥

जाति-धर्म के नाम पर, मत करना व्यापार।
हो भारत की एकता, सबसे ऊपर प्यार॥

इतिहासों की भूल को, फिर मत देना ठाँव।
नफरत से वीरान हों, ऐसा मत हो गाँव॥

माटी अपनी एक है, एक हमारा गाँव।
भाईचारे से सदा, बढ़े देश की छाँव॥

बाबर वाली चाल से, फिर बढ़ते कुछ पाँव।
औरँगजेबी सोच से, काँपा अपना गाँव॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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