मेरा पुराना स्कूटर
वो पुराना-सा स्कूटर,
आज भी आँगन में खड़ा है,
जैसे बीते हुए कल का
कोई किस्सा बनकर खड़ा है।
कितनी राहों का साथी था,
कितनी धूपें साथ सहीं,
कभी बाजार, कभी दफ्तर,
कभी परिवार की खुशियाँ गहीं।
तनख्वाह से पैसे बचाकर
जिस दिन घर में आया था,
उस दिन जैसे छोटे-से घर ने
अपना सपना पाया था।
न कर्ज़ की लंबी किस्तें थीं,
न दिखावे का कोई शोर,
कम साधन थे जीवन में,
पर खुशियाँ थीं कुछ और।
कभी किक में रूठ जाता,
कभी रास्ते में रुक जाता,
फिर भी घर का अपना सदस्य
बनकर हर मुश्किल निभाता।
— संजय एम तराणेकर
