दादू की गोद में खिलता आसमान
उस घर में जब भी नन्ही-सी हँसी की घंटियाँ बजतीं, लगता जैसे आँगन में वसंत उतर आया हो और दीवारों पर टँगी घड़ियाँ भी अपनी टिक-टिक भूलकर उस मधुर संगीत को सुनने लगी हों। उस हँसी का नाम था वेदु, और उसकी दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना था उसके दादू की गोद। दादू के लिए वह केवल पोती नहीं थी, बल्कि उम्र की ढलती साँझ में उगता हुआ वह सूरज थी, जिसकी सुनहरी किरणें बीते दिनों की थकान मिटाकर जीवन में नई सुबह का विश्वास जगाती थीं।
दादू सुबह आँखें खोलते तो सबसे पहले वेदु का चेहरा देखने की इच्छा होती। उनकी चाय ठंडी हो सकती थी, अखबार अधूरा रह सकता था, यहाँ तक कि कोई जरूरी काम भी कुछ देर के लिए टल सकता था, लेकिन वेदु की एक पुकार पर उनका सारा संसार ठहर जाता। वह दौड़कर उनकी गोद में चढ़ती, उनकी सफेद दाढ़ी को अपनी नन्ही उँगलियों से सहलाती और पूछती, “दादू, आपके बाल इतने सफेद क्यों हैं?” दादू मुस्कराकर कहते, “बिटिया, इनमें तुम्हारे पापा के बचपन की कहानियाँ छिपी हैं।” वह खिलखिलाकर पूछती, “और मेरी कहानियाँ कहाँ छिपेंगी?” दादू उसे सीने से लगाकर कहते, “तुम्हारी कहानियाँ तो मेरे दिल में लिखी जा रही हैं, मेरी गुड़िया!”
एक दिन वेदु खेलते-खेलते गिर पड़ी। घुटने पर हल्की-सी चोट आई, मगर उसकी आँखों में आँसू ऐसे उमड़े, मानो पूरा आकाश उसके छोटे-से मन में उतर आया हो। घर के लोग उसे समझाने लगे, पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुई। दादू ने उसे अपनी बाँहों में उठाया, चोट पर धीरे से फूँक मारी और बोले, “मेरी बहादुर बिटिया तो दर्द से भी दोस्ती कर लेती है।” वेदु ने सुबकते हुए पूछा, “दादू, आप हमेशा मेरे पास रहेंगे न?” यह प्रश्न सुनकर दादू की मुस्कान पलभर के लिए ठहर गई। उन्होंने उसके माथे को चूमते हुए कहा, “जब तक मेरी साँसों में दम है, तुम्हारा हाथ थामे रहूँगा। और जब कभी मैं तुम्हारे पास न भी रहूँ, तब मेरे प्यार को अपने भीतर महसूस करना। वह तुम्हें कभी अकेला नहीं होने देगा।”
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। वेदु के छोटे-छोटे कदम अब आँगन से निकलकर विद्यालय की राह पकड़ने लगे। दादू रोज उसे छोड़ने जाते और लौटते समय उसके लिए कभी रंगीन पेंसिलें, कभी छोटी-सी कहानी की पुस्तक, तो कभी उसकी पसंद की मिठाई ले आते। एक दिन वेदु ने देखा कि दादू सीढ़ियाँ चढ़ते समय पहले की अपेक्षा धीरे चलने लगे हैं। उसने उनका हाथ थाम लिया और बोली, “दादू, अब मैं बड़ी हो रही हूँ। अब आपको मैं सहारा दूँगी।” दादू की आँखों में नमी उतर आई। जिस नन्ही उँगली को उन्होंने कभी अपनी हथेली में छिपाकर चलना सिखाया था, आज वही उँगली उनके जीवन की लाठी बनने का वादा कर रही थी।
उस शाम वेदु ने अपनी छोटी-सी गुल्लक खोली। उसमें जमा सिक्के निकालकर दादू की हथेली पर रख दिए। दादू ने आश्चर्य से पूछा, “यह क्या है, बिटिया?” वेदु बोली, “आप मेरे लिए इतनी सारी चीजें लाते हैं न! अब मैं आपके लिए चश्मा खरीदूँगी, ताकि आप मेरी कहानियाँ और साफ-साफ पढ़ सकें।” दादू ने सिक्के वापस गुल्लक में रख दिए और उसे समझाया, “बिटिया, दादू को चश्मे से ज्यादा तुम्हारी आँखों की चमक प्यारी है। बस, तुम बड़ी होकर ऐसी इंसान बनना जो किसी के आँसू पोंछ सके, किसी कमजोर का हाथ थाम सके और किसी अकेले के जीवन में उम्मीद जगा सके। वही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।”
वेदु ने दादू की बात अपने मन में गाँठ बाँधकर रख ली। अब जब भी कोई बच्चा खेल में हारकर उदास होता, वह उसे अपने साथ खेलने बुलाती; कोई सहपाठी अपनी पुस्तक भूल जाता, तो वह अपनी पुस्तक उसके साथ बाँट लेती। दादू दूर से उसे देखते और मन ही मन सोचते कि प्रेम की सबसे सुंदर विरासत संपत्ति नहीं, संस्कार होते हैं। धन से भरा घर कुछ पीढ़ियों तक सुख दे सकता है, लेकिन करुणा से भरा हृदय अनगिनत जीवनों को रोशन कर सकता है।
एक रात सोने से पहले वेदु दादू के सीने से लगकर बोली, “दादू, जब मैं बहुत बड़ी हो जाऊँगी, तब भी क्या आपकी गोद में बैठ सकती हूँ?” दादू ने हँसते हुए कहा, “गोद छोटी हो सकती है, बिटिया, लेकिन दादू का दिल कभी छोटा नहीं होगा।” वेदु ने आँखें मूँद लीं। बाहर चाँदनी आँगन में बिछी थी और भीतर दो पीढ़ियों के बीच प्रेम का एक ऐसा पुल बन रहा था, जिसे न समय तोड़ सकता था, न दूरी मिटा सकती थी।
उस दिन दादू ने जाना कि जीवन की संध्या में सबसे सुंदर दीपक पोती की हँसी होती है, और वेदु ने जाना कि सच्चा प्रेम केवल दुलार पाना नहीं, बल्कि दूसरों के लिए दुलार, सहारा और संवेदना बनना भी है।
रिश्तों की असली समृद्धि महँगे उपहारों में नहीं, उन छोटे-छोटे पलों में बसती है जहाँ कोई नन्हा हाथ झुर्रियों भरी हथेली को थाम लेता है और कोई बूढ़ा हृदय अपनी सारी ममता एक मुस्कान में उड़ेल देता है। दादू और पोती का प्रेम हमें सिखाता है कि पीढ़ियों के बीच उम्र का अंतर भले हो, लेकिन स्नेह की भाषा एक ही होती है—निस्वार्थ अपनापन, सम्मान और एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ निभाने का संकल्प।
— डॉ. अशोक, पटना
