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जब शिष्य ने गुरु के साथ भरी जीवन की आखिरी उड़ान

मनुष्य के जीवन में कुछ यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे संघर्ष, साधना, अनुभव और संबंधों की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे रहती हैं। जब किसी व्यक्ति की जीवन यात्रा का समापन उसी स्थान पर, उसी साधन के साथ और उसी मार्गदर्शक की उपस्थिति में होता है, जहाँ से उसने अपना सफर शुरू किया था, तब वह घटना साधारण नहीं रह जाती। वह जीवन के एक पूर्ण चक्र का प्रतीक बन जाती है।

भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने अपने जीवन की अंतिम उड़ान 20 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद के निकट डुंडीगल स्थित भारतीय वायुसेना अकादमी में भरी। यह उड़ान इसलिए विशेष नहीं थी कि इसमें देश के सर्वोच्च वायुसेना अधिकारी ने भाग लिया, बल्कि इसलिए थी क्योंकि उनके साथ विमान में उनके वही प्रथम उड़ान प्रशिक्षक, सेवानिवृत्त विंग कमांडर वी. एस. कोचर बैठे थे, जिन्होंने 42 वर्ष पहले उन्हें आकाश में उड़ना सिखाया था। जिस स्थान से एक युवा प्रशिक्षु ने अपने सपनों को पंख दिए थे, उसी स्थान से उसकी उड़ान यात्रा का अंतिम अध्याय लिखा गया। यह संयोग कम और जीवन के प्रति कृतज्ञता की एक सुंदर अभिव्यक्ति अधिक था।

28 जनवरी 1984 को अमर प्रीत सिंह ने एचजे टी-16 किरण प्रशिक्षण विमान से अपनी पहली उड़ान भरी थी। उस समय वह एक युवा प्रशिक्षु थे और उनके साथ विमान में विंग कमांडर वी. एस. कोचर मौजूद थे। प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में विमान को नियंत्रित करना, आकाश की परिस्थितियों को समझना और उड़ान के दौरान धैर्य बनाए रखना उनके प्रशिक्षण का हिस्सा था। किसी भी प्रशिक्षु के लिए पहली उड़ान रोमांच और आशंका का मिला-जुला अनुभव होती है। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही युवा एक दिन भारतीय वायुसेना का नेतृत्व करेगा और चार दशक से अधिक समय बाद अपने उसी गुरु के साथ उसी प्रकार के विमान में अंतिम उड़ान भरेगा।

20 अक्टूबर 2026 को जब दोनों फिर एक बार उसी अकादमी में मिले, तो समय जैसे अपनी परिक्रमा पूरी करता दिखाई दिया। विमान का क्रमांक यू 707 था और उड़ान लगभग 55 मिनट तक चली। इस दौरान एक ओर देश की वायुसेना का सर्वोच्च अधिकारी था, तो दूसरी ओर वह गुरु था, जिसने कभी उसके भीतर एक कुशल विमान चालक बनने का विश्वास जगाया था। पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों के बीच यह संबंध अपनी सहजता और आत्मीयता के साथ उपस्थित था। विमान के उतरने के बाद सिंह ने इसे अपनी वर्दी में अंतिम उड़ान बताया और अपने प्रशिक्षक के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए सपने के सच होने जैसा था। वह चाहते थे कि उनकी उड़ान यात्रा का चक्र पूरा हो।

इस घटना का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि सर्वोच्च पद पर पहुँचने के बाद भी मनुष्य अपनी शुरुआत को नहीं भूला। जीवन में सफलता प्राप्त करना एक उपलब्धि है, लेकिन उस सफलता की यात्रा में योगदान देने वालों को याद रखना उससे भी बड़ा मानवीय गुण है। आज जब समाज में पद, प्रतिष्ठा और अधिकार को अक्सर व्यक्ति की पहचान का आधार बना दिया जाता है, तब एक वायुसेना प्रमुख का अपने प्रथम प्रशिक्षक के प्रति आभार व्यक्त करना हमें याद दिलाता है कि किसी भी ऊँचाई तक पहुँचने के पीछे अनेक लोगों का योगदान होता है। कोई हमें पहला कदम उठाना सिखाता है, कोई कठिनाइयों में संभालता है और कोई हमारी क्षमताओं पर तब विश्वास करता है, जब स्वयं हमें अपने सामर्थ्य का पूरा ज्ञान नहीं होता।

विंग कमांडर वी. एस. कोचर के लिए भी यह अवसर कम भावुक नहीं रहा होगा। 73 वर्ष की आयु में अपने पूर्व प्रशिक्षु के साथ फिर विमान में बैठना उनके लिए एक विशेष अनुभव था। उन्होंने सिंह को अपना सबसे प्रतिभाशाली शिष्य और एक श्रेष्ठ वायुसेना प्रमुख बताया। गुरु की दृष्टि में शिष्य की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उसके अपने परिश्रम और मार्गदर्शन की सार्थकता का प्रमाण भी होती है। जब कोई शिष्य अपनी योग्यता, अनुशासन और समर्पण से ऊँचाइयाँ प्राप्त करता है, तो गुरु का हृदय गर्व से भर उठता है। इस उड़ान में दोनों की भूमिकाएँ भी एक अर्थ में बदल चुकी थीं। कभी प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में सीखने वाला युवा अब देश की वायुसेना का नेतृत्व कर रहा था, लेकिन उनके संबंध की आत्मीयता समय और पद के अंतर से अप्रभावित रही।

अमर प्रीत सिंह का सैन्य जीवन भी निरंतर परिश्रम और अनुभव से निर्मित हुआ। दिसंबर 1984 में लड़ाकू विमान शाखा में नियुक्त होने के बाद उन्होंने अनेक उत्तरदायित्व निभाए। वायुसेना अकादमी से सम्मान सहित उत्तीर्ण होने वाले सिंह ने अपने लंबे सेवाकाल में विभिन्न प्रकार के विमानों को उड़ाया। उनके उड़ान अनुभव में 5000 घंटे से अधिक का समय शामिल है। मिराज, सुखोई, जगुआर और तेजस जैसे विमानों से जुड़े अनुभव ने उनके व्यावसायिक जीवन को व्यापक बनाया। स्वदेशी तेजस विमान के परीक्षण से भी उनका जुड़ाव रहा। उनका सफर केवल व्यक्तिगत उन्नति की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य विमानन की बदलती क्षमताओं और तकनीकी विकास का भी साक्षी रहा है।

इस अंतिम उड़ान से कुछ दिन पहले, 12 अक्टूबर को उन्होंने जोधपुर में स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान से अपनी अंतिम लड़ाकू उड़ान भरी थी। उसके बाद किरण प्रशिक्षण विमान से अंतिम उड़ान ने उनके विमान संचालन जीवन को एक भावनात्मक पूर्णता प्रदान की। तेजस और किरण दोनों उड़ानों का अपना अलग महत्त्व था। एक ने उनके लड़ाकू विमान संचालन के अध्याय को विराम दिया, तो दूसरी ने उस यात्रा को वहीं पहुँचाया जहाँ से उसका आरंभ हुआ था। विशेष बात यह भी थी कि जिस किरण विमान ने उनके प्रशिक्षण के शुरुआती दिनों में साथ दिया था, वह विमान प्रकार आज भी वायुसेना की प्रशिक्षण व्यवस्था में अपनी भूमिका निभा रहा है। सिंह ने इस बात को भी अपने लिए विशेष अनुभव बताया।

इस घटना में भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परंपरा की झलक भी दिखाई देती है। हमारे यहाँ गुरु को केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं माना गया, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मार्गदर्शक समझा गया है। गुरु का योगदान पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं रहता। वह शिष्य में अनुशासन, आत्मविश्वास, विवेक और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है। वायुसेना जैसे अनुशासित क्षेत्र में यह भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जहाँ एक छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम ला सकती है। प्रशिक्षक अपने अनुभव से प्रशिक्षु को केवल विमान उड़ाना नहीं सिखाता, बल्कि कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना और अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहना भी सिखाता है।

यह घटना हमें यह भी समझाती है कि आधुनिक तकनीक और बदलते समय के बीच मानवीय संबंधों का महत्त्व कम नहीं होता। विमान कितने ही उन्नत क्यों न हो जाएँ, उनके संचालन के लिए प्रशिक्षित मनुष्य, अनुशासन, अनुभव और निर्णय क्षमता आवश्यक रहते हैं। इसी प्रकार किसी भी क्षेत्र में सफलता केवल साधनों से नहीं मिलती। उसके लिए मार्गदर्शन, अभ्यास, धैर्य और निरंतर सीखने की इच्छा भी चाहिए। जो व्यक्ति अपनी सफलता के शिखर पर पहुँचकर अपनी शुरुआत को याद रखता है, वही अपनी उपलब्धियों के वास्तविक अर्थ को समझ पाता है।

31 अक्टूबर 2026 को अमर प्रीत सिंह अपने पद से सेवानिवृत्त होंगे और एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित भारतीय वायुसेना के अगले प्रमुख का कार्यभार संभालेंगे। पद बदलेंगे, नई जिम्मेदारियाँ आएँगी और समय के साथ विमानन तकनीक भी आगे बढ़ेगी, लेकिन डुंडीगल में भरी गई यह उड़ान एक अलग कारण से याद रखी जाएगी। वह हमें बताएगी कि जीवन में ऊँचाई प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना उससे भी अधिक मूल्यवान है। गुरु का सम्मान करने के लिए किसी विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी जब जीवन का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो रहा हो, तब गुरु के साथ बिताया गया वह क्षण कृतज्ञता का अनुपम उदाहरण बन जाता है।

आसमान में उड़ते विमान की तरह मनुष्य की यात्रा भी कभी आरंभ होती है, कभी ऊँचाइयाँ छूती है और अंततः एक पड़ाव पर पहुँचती है। अमर प्रीत सिंह की अंतिम उड़ान ने इस सत्य को एक सुंदर रूप दिया। चार दशक पहले जिस गुरु ने उन्हें उड़ना सिखाया था, उसी गुरु के साथ उन्होंने अपनी उड़ान यात्रा पूरी की। यह केवल एक विमान की उड़ान नहीं थी, बल्कि विश्वास, अनुशासन, सम्मान और कृतज्ञता की उड़ान थी। डुंडीगल के आकाश में उस दिन एक शिष्य ने अपने गुरु के साथ अपने जीवन का एक चक्र पूरा किया और यह संदेश छोड़ गया कि पद कितना भी ऊँचा क्यों न हो जाए, मनुष्य की महानता उसकी विनम्रता और अपने मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान में ही निहित रहती है।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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