डिफॉल्ट

यदि आज रावण जीवित होता

    विजयादशमी की बधाई देने मित्र यमराज मेरे महल में पधारे। बधाई तो नहीं दी, सवाल जरूर पूछ लिया – “यदि आज रावण जीवित होता तो क्या सोचता?”
      मैंने कहा – क्या सोचता? सबसे पहले तो तेरे धरती लोक आने पर रोक लगाने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में डालता। उसके बाद शायद इस बात से सबसे ज्यादा हैरान होता। कि वो जिस सोने की लंका पर घमंड करता था, आज देखता तो माथा पीटता रह जाता, क्योंकि या तो चोर डकैत उसकी लंका ही लूट चुके होते , कोई भूमाफिया उस पर कब्जा कर चुका होता, , फिरौती के लिए उसके परिवार के किसी सदस्य का अपहरण हो जाता, वसूली गैंग तरह-तरह से डराने का प्रयास करता। इसके अलावा सरकार और सत्तारूढ़ दल अपनी पार्टी का फंड बढ़ाने के लिए ईडी, सीबीआई लगवा देते, चुनाव आयोग मेरे पुरखों के नाम पुराने वोटर लिस्ट में होने का प्रमाण मांगता। इतना कुछ नहीं होता तो बुलडोजर बाबा आय से अधिक सम्पत्ति की जांच का और वैध कागजात प्रस्तुत करने का नोटिस जारी करवा देते। क्या पता जब तक मेरे लोग जवाब दे पाते बुलडोजर चलवा कर मेरी लंका को मैदान बना चुके होते। सबसे मुश्किल तो तक होता जब काकरोच मुझे भी सिंहासन छोड़ने का दबाव बनाने के लिए धरना प्रदर्शन, हिंसा आगजनी, तोड़-फोड़ करने सीधे लंका ही आ जाते। ये सब न होता तो क्या पता उसकी हवेली पर अब तक वक्फ बोर्ड वाले बोर्ड का कब्जा होने का दावा कर चुके होते।
    ऐसे में बेचारा ये भी न सोच पाता कि अपने दस सिरों में से कौन सा सिर पीटे। आज नेताओं, अफसरों, ठेकेदारों ही नहीं हर प्राणी के दस नहीं, सौ चेहरे हैं। सुबह कुछ, शाम कुछ, कैमरे पर कुछ, भीतर कुछ। रावण तो कम से कम अपने दसों सिर से एक ही बात कहता था – “मैं ही ब्रह्म हूँ।” आज का आदमी एक सिर से भी एक बात नहीं कहता। लोगों की आँखों में धूल झोंकना, धर्म-ईमान का सौदा करना, राष्ट्र को ही गिरवी रखने के जुगाड़ में लगना – यही आज की रीति है। राष्ट्र को धर्म, जाति, भाषा, कट्टरपंथ, साम्प्रदायिकता, लूटपाट, दंगा-हिंसा की आग में झोंकने के नए-नए जतन होते हैं। अपने और अपनों को लूटने में भी संकोच नहीं। मीठे बोल और शुभचिंतक होने की आड़ में बड़ी सफाई से धोखा। बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं, रिश्ते की आड़ में रिश्तों को नापाक किया जा रहा है।
    यमराज ने मुझे रोककर कहा – “मगर प्रभु! रावण तो विद्वान, वेदपाठी, शिवभक्त था। आज होता तो किसी यूनिवर्सिटी का कुलपति होता, यूट्यूब पर उसके प्रवचनों के मिलियन फॉलोअर होते। लोग कहते – देखो, कितना बड़ा ज्ञानी है, पर उतना ही अहंकारी भी।”
       मुझे गुस्सा आ गया – “तू बेवकूफ है! आज वो सिर्फ किसी राजनीतिक दल का छुटभैया नेता बनकर रह जाता। क्योंकि वो बेवकूफ होता, अपनी लंका बचाने के चक्कर में उलझा रहता। सीता जी का हरण कोई और करता, फंँसाया ये जाता। फिर कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता, बड़े नेताओं के तलुवे चाटता। उनको फंडिंग अलग से करता। जिद्दी था, अपनी बात ही ऊपर रखता और फिर तिहाड़ जेल में बैठकर झुनझुना बजाता। हाँ, मेघनाद का भाग्य जरूर चमक जाता – सांसद-विधायक बन जाता। विभीषण मार्गदर्शक मंडल में होता। कुंभकर्ण आलसी था, सिर्फ भीख माँगता। कोई रहम करता तो राशनकार्ड जरूर बनवा देता।”
     उसको लेकर आज का मीडिया भी दो हिस्सों में बंटा नजर आता। एक कहता – “रावण ने महिला का अपमान किया”, दूसरा कहता – “रावण तो धर्म प्रेमी था, राम ने सीता जी की अग्निपरीक्षा लेकर अत्याचार किया।” ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड होता। राजनीतिक दल उसको लेकर धरना, प्रदर्शन, हिंसा, तोड़-फोड़, घेराव, भारत बंद और जाने क्या-क्या करते।
  रावण को हम हर साल जलाते हैं, भले ही वो पुतला है। इससे बच जाता, क्योंकि वो इसके कोर्ट में याचिका दायर कर देता। लेकिन असली समस्या तो यह है कि रावण, जो हर मन में रहता है – घमंड, लालच, ईर्ष्या, वासना, झूठ – उसका क्या? दशहरे के मेले में रावण का पुतला जलता है, लोग ताली बजाते हैं, सेल्फी लेते हैं, घर आकर फिर वही करते हैं, जो शायद आज वो रावण भी नहीं करता।
      यमराज ने मुझे रोका – “बस प्रभु, समझ गया। यदि आज रावण जीवित होता तो निश्चित ही शर्मिंदा होता। और यही सोचता – मैं तो एक ही था, मगर आज तो हर गली में रावण घूम रहे हैं। मैंने तो एक सीता का हरण किया था, आज तो पूरी सीता-संस्कृति का ही हरण हो रहा है। अच्छा था, मेरा वध तो राम जी ने कर दिया, कम से कम मोक्ष तो पा गया। आज तो लाख तपस्या करने पर भी कितनों को मोक्ष मिलता है? या ये कहें कि कितने इस योग्य हैं?”
       मैंने यमराज के कंधे पर हाथ रखा – “सही कहा मित्र, शायद इस कलियुग में रावण बनना भी अब कोई बड़ी बात नहीं रही, इसलिए असली रावण आत्महत्या करने पर विचार करता और घुट-घुटकर मर जाता।”
    इतना सुनते ही यमराज गंभीर हो गया – अब बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आप को इतना सबकुछ कैसे पता है?
    मैंने व्यंग्य से सपाट शब्दों में कहा कि वास्तव में वो रावण मैं ही हूँ। जो चुपचाप अपनी ठसक बनाए रखने के लिए इस कलयुग में अपनी पहचान छुपाकर अज्ञातवास जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं।
    यमराज ने आश्चर्य से मुझे घूरा, फिर हाथ जोड़कर बोला – जय हो लंकाधिपति महाराज रावण की। 
      ……..और बेवकूफ दो कप चाय बेकार कर फ़ुर्र हो गया। 
      
सुधीर श्रीवास्तव 

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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