दोहा
कीचड़ आप उछालिए, बेशर्मी से खूब।
आज हाथ मलना नहीं, कल जाना तुम डूब।।
दाता बनते हैं सभी, और दिखाते दंभ।
हुई नहीं उनमें अभी, मानवता आरंभ।।
मानव मन कंकाल का, कैसे हो उपयोग।
आज समय के साथ ही, बढ़ता जाए रोग।।
मानव मन कंकाल का, कैसे हो उपयोग।
जितना इसे कुरदिए, उतना फैले रोग।।
ओजस्वी वाणी सदा, छोड़े अपनी छाप।
छिप जाएगा आपका , छोटा मोटा पाप।।
होते जाते क्यों भला, तन- मन से निस्तेज।
दुनियादारी छोड़कर, पहले आप सहेज।।
कल की चिंता छोड़कर, आज में रहना सीख।
जिसको देखा है नहीं, उसकी कैसी भीख।।
चाट रहे तलवे वही, जिनको है अभिमान।
स्वार्थ लोभ लिप्त हैं, भूलें खुद का मान।।
चाट-चाट कर रोज तुम, बनते हो जो शेर।
तलवे जिसका चाटते, समझें तुमको बेर।।
खुद्दारी की बात अब, रहती किसको याद।
बस तलवे है चाटना, संग करें फरियाद।।
गली-गली में शोर है, नहीं सुने सरकार।
भले लोग कुछ भी करें, व्यर्थ सभी तकरार।।
जगह-जगह फैला दिखे, सबको भ्रष्टाचार।
गली-गली में शोर है, क्या इसका उपचार।।
रोजी-रोटी के लिए, युवा वर्ग हैरान।
गली-गली में शोर है, मगर किसे है ध्यान।।
कल किसने देखा भला, फिर भी नाहक रार।
गली-गली में शोर है, व्यर्थ सभी रफ्तार।।
मन में उठे तरंग जब, लेता प्रभु का नाम।
लोग कहें अपराध है, इसीलिए बदनाम।।
जीवन सुख सागर सखे, झूठ साँच का खेल।
जीना आज में सीख ले, चलती जाए रेल।।
पहली प्रेम तरंग का, चित्रण करता कौन।
मुस्काता है गर्व से, पर रहता है मौन।।
दोहा जैसे छन्द का, हो जाता जब ज्ञान।
विविध छंद कविगण रचें, फिर बनते विद्वान।।
दोहा जैसा छंद तो, छंदों का वटवृक्ष।
सीधे शब्दों में कहें, कविगण के अध्यक्ष।।
दोहा जैसे छंद को, जो लेता है साध।
छंद सृजन उसका सदा, चलता रहे अबाध।।
दोहा के संग ही खुले, कविता का हर द्वार।
शब्द -शब्द मोती बने, और अर्थ तब हार।।
सीधा बनने से नहीं, आज चलेगा काम।
व्यर्थ मिलेंगी गालियाँ, अरु होंगे बदनाम।।
जग के मेले में मिले, फिर भी नहीं है मेल।
खिलता जैसे कमल दल, रहे दूर जल खेल॥
प्रीत पृथक जब देह से, प्राण पृथकता भास।
जैसे धागा अरु सुई, बँधे संग विश्वास।।
भिन्न-भिन्न हैं आदतें, भिन्न-भिन्न व्यवहार।
भाव एक ही प्रेम का, मात्र एक आधार॥
दीया से बाती विलग, होता नहीं उजास।
और विलग जो प्रीत से, नाहक सभी प्रयास॥
सबसे मिलकर भी लगे, तू ही सबसे खास।
वैसे भी मुझको नहीं, व्यर्थ किसी से आस॥
आधा ही हम आप हैं, इसका समझें सार।
कुछ तो अपने कर्म हैं, कुछ अपना व्यवहार।।
नीर-क्षीर को परखना यही मराल का काम।
ज्ञानी चुनता सार को, तजकर झूठ तमाम।।
सरवर दिखे मराल जब, शोभा बढ़े अपार।
हंस बीच तब वो लगे , जैसे मोती हार।।
रात-रात भर करवटें, लेकर बड़ा अधीर।
जागे उसकी याद में, और बहाए नीर।।
बूढ़ा पीपल देखता, करवट लेता गाँव।
छाँव उसी के आ रुकें, थककर हारे पाँव।।
चाहे जितनी भी घृणा, करते रहिए आप।
पर करने दूँगा नहीं, अब मैं कोई पाप।।
हमें छोड़कर मित्रवर, कहाँ जा रहे आप।
परछाईं मैं आपकी, मत मानो अभिशाप।।
कोशिश करके देख लो, और छुड़ाओ हाथ।
परछाईं मम नाम है, रहे मृत्यु तक साथ।।
पायल की झंकार भी, डरा रही है आज।
पढ़ लिखकर कैसा हुआ, अपना नया समाज।।
नारी को अब आजकल, होने लगा विछोह।
पायल से है घट रहा, पहले वाला मोह।।
लज्जा की क्या बात है, या मन भरा विकार।
सज्जन होता कब भला, आप कहो लाचार।।
मन में नहीं विकार हो, सज्जन करे प्रयास।
लज्जा से वे हीन हैं, जिनको झूठी आस।।
चाहे जितना हम सभी, करें नित्य अभियान।
आता निश्चित एक दिन, समय सिखाता ज्ञान।।
समय सिखाता ज्ञान है, जिसको इसका बोध।
उसके जीवन में नहीं, आता है अवरोध।।
कुछ मूरख इस जगत में, जो बनते अंजान।
उन सबको एक ही दिन, समय सिखाता ज्ञान।।
नाहक ही हम आप सब,क्यों करते तकरार।
नहीं समझते क्यों भला, दुखी करें संसार।।
करता नहीं विचार तू, क्यों करता तकरार।
आखिर कैसे मिल रहा, बार-बार आधार।।
क्यों करता तकरार है, खुलकर कह तू आज।
जग को मत गुमराह कर, छिपा रहा है राज।।
करो झूठ का त्याग तुम, अगर हुआ कुछ बोध।
वरना सहते ही रहो, नित नूतन अवरोध।।
तुमसे कहना व्यर्थ है, करो झूठ का त्याग।
क्योंकि अच्छे लग रहे, लगता हैं जो दाग।।
सच कहने से डर लगे, झूठ है जिनकी मीत।
ऐसे जन की क्या कहें, बदली जिनकी रीत।।
चिंता इतनी मोक्ष की, क्यों करते हो आप।
वाणी अरु व्यवहार का, दूर करो संताप।।
मोक्ष मिलेगा आपको, आओ मेरे पास।
नहीं पता क्या आपको, यम हैं मेरे खास।।
मोक्ष मिलेगा या नहीं, प्रश्न बड़ा है गूढ़।
उत्तर इसका एक है, बनकर रहिए मूढ़।।
काम धाम करना नहीं, बाँट रही सरकार।
जब भी मिलता मुफ्त में, देते हाथ पसार।।
भले बिसारे आप हो, पर जिनको दरकार।
सुबह सबेरे आ खड़े, देते हाथ पसार।।
देते हाथ पसार जो, नहीं दीन सब लोग।
लेकर कुछ की आड़ में, कुछ बन जाते रोग।।
राजनीति के खेल में, बने हुए मक्कार।
यही सीख सबसे भली, देते हाथ पसार।।
लेना-देना छोड़कर, माँग रहा है गाँव।
पौरुष गिरवी रख दिया, चाह भीख की छाँव।।
कायल होकर क्या करूँ, मूरख कहते लोग।
मैँ भी अब हूँ सोचता, पाला कैसा रोग।।
खुद के कायल जब स्वयं, बन जाओगे आप।
सच मानो उस दिन सभी, दूर सभी संताप।।
कोई कायल जब नहीं, फिर मेरा क्या दोष।
मगर नहीं मैं चाहता, करना खुद पर रोष।।
विश्व पटल पर मिल रही, नित नूतन पहचान।
न्याय विलंबित आज भी, इस पर भी हो ध्यान।।
सत्य अहिंसा न्याय का, बने नया गठजोड़।
तभी राष्ट्र की प्रगति में, आयेगा नव मोड़।।
न्याय नीति पर आज तो, चर्चा होती खूब।
यदि मिलता है देर से, पीड़ित जाता डूब।।
प्रभो विश्वकर्मा सदा, रखें हमारा ध्यान।
नित नूतन निर्माण का, देते जग को ज्ञान।।
देव शिल्प के संग में, सृजन सार आधार।
कृपा विश्वकर्मा करें, पा जाता आकार।।
साधक शिल्प के जो सभी, शीश झुकाते नित्य।
देव विश्वकर्मा बिना, व्यर्थ सकल औचित्य।।
पद्मा जैसे नैन हैं, अरु सुंदर मुस्कान।
खिलते हैं जस कमलदल, बने श्रेष्ठ अनुदान।।
कीचड़ में खिलते कमल, पद्मा निर्मल नाम।
जल में रहकर भी कभी, करता नहीं गुमान।।
मन घायल होता रहा, पर मुख थी मुस्कान।
उसकी ऐसी भावना, है ईश्वर वरदान।।
कौन आज घायल नहीं, बड़ा प्रश्न है आज।
सभी छिपाए घूमते, अपने दिल का राज।।
मेरा घायल मन करे, केवल यही पुकार।
हर प्राणी खुशहाल हो, कृपा करो दातार।।
नाहक जो सोता रहे, करें नहीं कुछ काम।।
कर देता है खोखला, शनै-शनै आराम।।
सह लेना संताप अब, मुझे नहीं स्वीकार।
या फिर आप बताइए, क्या इसका आधार।।
धर्म-कर्म भूलो मगर, मत करना तुम पाप।
ईश कृपा सब मानकर, सह लेना संताप॥
जीवन का सिद्धांत यदि, करते रहना पाप।
फिर तो मुश्किल है नहीं, सह लेना संताप।।
हरि इच्छा को मानकर, सह लेना संताप।
ऐसा करने से भला, धुल जाएगा पाप।।
अर्वण दौड़े वेग से, रुके नहीं वो राह।
जस भक्तों की भावना, जिसे ईश की चाह।।
मन के अर्वण दौड़ते, करते नहीं विचार।
इसीलिए तो हम सभी, हो जाते लाचार।।
लगा रहे चूना सभी, मौका पाकर लोग।
कर लेते संतोष हम, मान इसे संयोग।।
पत्थर के भगवान भी, नहीं रहे नादान।
क्योंकि उनके भक्त अब, बनते स्वयं महान।।
मंदिर -मंदिर भीड़ है, जल्दी में हैं लोग।
भक्ति दिखावे की बड़ी, फैले कलयुग रोग।।
दर्शन दो पल का करें, घंटों करें बखान।
मन में तो कुछ और, फिर भी भक्त महान।।
बाहर उजला भेष है, भीतर काला भेद।
माला हाथ से छूटता, मन में गिनते खेद।।
जगह-जगह मंडी खुली, मिल जाते सामान।
नीति नियम सिद्धांत पर, कौन रहा दे ध्यान।।
चंडी बनकर बेटियाँ, बचा रहीं निज लाज।
जब भूले हैं हम सभी, जिम्मेदारी आज।।
बच्चे अब देने लगे, मातु-पिता को ज्ञान।
पढ़ा रहे हैं आजकल, अपना रचित विधान।।
मन के सच्चे इन दिनों, सहते हैं अपमान।
फिर भी रहते मौन हैं, बनकर के अंजान।।
जीवन ज्योति जलाइए, फैले नया उजास।
प्रभु की होगी तब कृपा , करते रहें प्रयास।।
जीत प्रतीक्षा में खड़ी, आगे बढ़िए आप।
पड़े -पड़े करिए नहीं, झूठा व्यर्थ विलाप।।
जिनके मन में हार का, चुभा हुआ है दंश।
उनके हिस्से में नहीं, कभी जीत का अंश।।
अंर्तमन में हों सदा, सतगुरु देव महान।
जीवन तो बस आज है, आए कहाँ विहान।।
मैना बोली पिया से, कोशिश करिए आज।
पिंजर तोड़ो हम चलें, अपना होगा राज।।
आँगन में मैना दिखी, बोल रही थी बैन।
धरती पर अब है नहीं, पहले वाली चैन।।
घर की रौनक बेटियाँ, आँगन की मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नहीं हार को मानिए, निज जीवन का अंत।
यह ऐसा उपहार है, पाते ज्ञानी संत।।
नहीं प्यार के फेर में, पड़ना तुमको यार।
इसके आगे देख तू, पहले जीवन सार।।
एक बार इज्जत घटी, बने नहीं फिर बात।
बिना वजह खाना पड़े, नाहक में ही लात।।
एक बार इज्जत घटी, कट जाती है नाक।
व्यर्थ सफाई आपकी, बन जाती नापाक।।
एक बार इज्जत घटी, मिले न आदर मान।
जीवन भर अपमान का, लगा रहे इल्जाम।।
सद्गुरु सुमिरन नाम से, मिटे कष्ट का सार।
भव बाधा से मुक्त हो, कर जीवन उद्धार।।
दौलत का ऐसा नशा, होता खूब बवाल।
बुद्धि हुई निष्काम है, सारा जग बेहाल।।
सारा जग बेहाल है, नहीं खास ये बात।
अपने-अपने स्वार्थ में, लुप्त हुई सौगात।।
आज ग्रहों के फेर में, सारा जग बेहाल।
बैठा कलयुग शीश पर, होता जन कंगाल।।
समझ रहे भगवान भी, भक्ति भाव का खेल।
भली भाँति वो जानते, किसका कैसा मेल।।
ईश्वर की चाहो कृपा, तो फिर करो प्रयास।
उसके पहले कीजिए, थोड़ा तो विश्वास।।
प्रभु चरणों में सौंप दो, जीवन का जंजाल।
दूजा कोई भी नहीं, होगा पुरसाहाल।।
सदा विधाता रख रहे, सबके हित का ध्यान।
फिर भी रहते हम सभी, बने मूर्ख अंजान।।
परमात्मा तो नित करें, हृदय हमारे वास।
पर दिखता हमको नहीं, उनका कहीं उजास।।
ईश्वर से बढ़कर भला, सच्चा साथी कौन।
वही उजाला दे हमें, रहो आप बस मौन।।
साथी सच्चा है वही, जो दुख में दे साथ।
बिना किसी भी स्वार्थ के, थामे रहता हाथ।।
साथी सच्चा शब्द है, जीवन का आधार।
इनके बिन सूना लगे, अपना ये संसार।।
साथी जग में ढूँढ़ते, मिले न कोई मीत।
अंतर्मन में झाँकिए, करिए प्रभु से प्रीत।।
नमस्कार का आजकल, बदल गया है अर्थ।
सिर्फ दिखावा ही लगे, बाकी सब कुछ व्यर्थ।।
नमस्कार का इन दिनों, बदला सकल स्वरूप।
मुख पर तो मुस्कान है, भीतर काली धूप।।
नमस्कार की ओट में, छुपा रहे निज भाव।
मौका पाकर दे रहे, हम ही गहरा घाव।।
लालटेन का युग हुआ, अब तो बस इतिहास।
पर मूरख वे लोग हैं, जो कहते क्या खास।।
नाव बीच मझधार में, नदी रूप विकराल।
सतगुरु खेवनहार हैं, क्यों होना बेहाल।।
सतगुरु सौंपा नाव निज, नदी कराएं पार।
बिन बाधा मझधार के, वे ही तारणहार।।
छोटी सी मम नाव है, पहुँच गई मझधार।
एक आस मुझको यही, जाना है उस पार।।
पता पूछते हैं सभी, भले न आते द्वार।
वे सब भी तो जानते, व्यर्थ बनाना भार।।
जिनको मंजिल का पता, क्या उनको है ज्ञान।
या तो वो गुमराह हैं, या फिर हैं अंजान।।
बिटिया से ही शान है, यही हमारा मान।
उसी भरोसे आज भी, अटकी है यह जान।।
बेटी से ही जगत का, हरा-भरा संसार।
रक्षा इनकी हम करें, देकर प्यार दुलार।।
राजनीति में हो रही, बातें बड़ी विचित्र।
भले आप मानो नहीं, जो मैं कहता मित्र।।
अभिवादन स्वीकारिए, विनय मानकर आप।
शीश झुकाकर आप क्यों, चढ़ा रहे हैं पाप।।
अभिवादन में है छिपा, अतुलनीय सद्भाव।
बदले में मत दीजिए, कभी किसी को घाव।।
ध्यान सभी रखिए सदा, जो जिसका आधार।
देने वाला एक है, कहते सब दातार।।
धरा सहित पितु-मातु को, प्रात करो प्रणाम।
इतने भर से आपको, मिले नया आयाम।।
जो भी अपने हों बड़े, करिए भोर प्रणाम।
तब मिलता आशीष है, बिना स्वार्थ निष्काम।।
अंबर सम होते पिता, जिसको इसका बोध।
उसका जीवन कट रहा, बिना किसी अवरोध।।
माँ के आँचल में मिले, अंबर जैसी छाँव।
सबको ही शीतल लगे, व्यर्थ ढ़ूँढ़ना ठाँव।।
पतित जनों को जो उठा, देता नया विहान।
मात-पिता सम पूज्य वह, रखे सभी का मान।।
पतितों के कल्याण में, कैसा है संकोच।
पर मुश्किल है यह बड़ी, आप दिखाते मोच।।
पितृपक्ष / पितर पक्ष
पितर सभी के एक से, नहीं बघाऱो शान।
शीश झुकाते हैं सभी, पितृ बढ़ाते मान।।
देने आते आशीष हैं, हम सबके ही द्वार।
पितर बढ़ाते मान हैं , कहते मत तू हार।।
कहें मित्र यमराज जी, सुनो लगाकर कान।
पितर बढ़ाते मान के, संग हमारी शान।।
पितर बढ़ाते मान हैं, इसका करिए बोध।
व्यर्थ स्वयं की राह में, मत बनिए अवरोध।।
पितर पक्ष में पितृगण, देते शुभ आशीष।
इनके ही आशीष से, बन सकते अवनीश।।
पितरों के सत्कार का, समय बड़ा है खास।
जब होती इनकी कृपा, जीवन सदा उजास।।
करना सबको चाहिए, पितरों का सत्कार।
नित नूतन बहती रहे, जीवन आप बहार।।
पितर पक्ष में आ बनें, सबके ही मेहमान।
पितरों का सत्कार कर, भूलें सकल गुमान।।
पितर सभी के पूज्य हैं, करें गर्व हम आप।।
जीवन होता गुलजार है, मिटते सब संताप।।
पितरों का सम्मान हो, तो जीवन गुलजार।
मिटते हैं संताप सब, होता है सत्कार।।
जल तिल अक्षत भाव से, पितरों को दें आज।
करे श्राद्ध संतान जो, बढ़े वंश का राज।।
पितर पक्ष है आ गया, खुले मुक्ति का द्वार।
तर्पण देती तृप्ति है, संग पितर उद्धार।।
गाय, श्वान औ काग को, जो देते हैं भोग।
तृप्त पितर आशीष दे, सुख समृद्धि का योग।।
पितरों का तर्पण करें, दे जल अक्षत फूल।
उनके ही आशीष से, मिटे हृदय के शूल।।
तर्पण श्रद्धा भाव है, नहीं मात्र यह कर्म।
पितरों का आशीष ही, इसका पावन मर्म।।
पितर पक्ष फिर आ गया, लेकर श्रद्धा भाव।
पुरखे आते हैं धरा, हरने वंशज घाव।
