सेवा में पक्षपात महापाप है
सेवा का अर्थ सही,अपनों पर ही प्यार लुटाना,
हर जरूरतमंद को समान भाव से गले लगाना,
जहाँ भेदभाव हो,वहाँ सेवा का मान घट जाता है,
निष्पक्षता के बिना हर पुण्य भी अधूरा रह जाता है।
चेहरा देखकर सेवा करना,मानवता का अपमान है,
अपने-पराए में भेद करना,करुणा का अवसान है,
जहाँ स्वार्थ की तुला पर इंसानियत तोली जाती है,
वहाँ सेवा नहीं,केवल पक्षपात की आग जलती जाती है।
न धन का अभिमान हो,न पद का कोई अहंकार,
हर पीड़ित के लिए खुले हृदय के सेवा-द्वार,
जो बिना भेद सबके दुःख को अपना दुःख मानता है,
वही सच्ची सेवा का पावन अर्थ जानता है।
सेवा के पथ पर चलकर कभी अन्याय मत करना,
किसी के हक़ को छीनकर अपनों का भला मत करना,
कर्मों की अदालत में हर निर्णय का हिसाब होगा,
पक्षपात के पुण्य पर भी पाप का नकाब होगा।
सेवा में समभाव रखो, यही जीवन का सार है,
निष्पक्षता से बढ़कर नहीं कोई धर्म-संस्कार है,
किशन सबको एक दृष्टि से देखे,वही महान कहलाता है
सेवा में पक्षपात महापाप है,इतिहास यही सिखाता है।
— किशन सनमुखदास भावनानी
