कविता

दीप की रोशनी

दीप जलता है खुद को जलाकर
रोशनी देता है सबको बिखेर।
खुद के अंधकार को दूर कर
दूसरों को रास्ता दिखलाकर।

किसी और को जलाकर खुशी नहीं
दीप तो खुद को जलाता है
रोशनी देकर सबको सुखी कर
दिल को सुकून दिलाता है।

आओ हम भी दीप की तरह जले
रोशनी दें सबको बिखेर कर।
दूसरों के जीवन में उजाला कर
सुख-शांति का मार्ग दिखलाएं कर।

दीप की रोशनी से सीख लें हम
खुद को जलाकर रोशन करें।
दूसरों के जीवन में उजाला भर
अपना जीवन सफल बनाएं कर।

— डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)

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