सोरठा छंद
रखते सबका ध्यान, तुम ही जग करतार प्रभु।
अपना समझें मान, ज्ञानी हम बनते सदा।।
अद्भुत खेल अपार, करता है करतार तू।
हो जाता भव पार, श्रद्धा से सुमिरन करे॥
कण-कण जिसका वास, दृष्टि एक करतार की।
बिना रखे ही आस, मूर्ख खोजते धाम हैं॥
मानवता से प्यार, बड़ी जरूरत आज की।
सब मिल करें विचार, कैसा यह संसार हो।।
विधि का यही विधान, जो बोया सो काट तू।
नित नूतन व्यवधान, चाहे जितना डाल ले।।
कितना लेगा चाट, मूर्ख बने रहकर भला।
जो बोया सो काट, आयेगा सब सामने।।
लेना है अभिशाप, जानबूझकर क्यों भला।
करते हो जो पाप, पहले अपना देखिए।।
गहरा होता दंश, जीवन में अभिशाप का।
बस छोटा सा अंश, लगता है भले ही।।
तभी शेष हैं प्राण, आस तभी जब स्वास है।
जीने का अरमान, जिजीविषा से शेष है।।
थके नहीं है पंख, उड़ने की चाहत अभी।
बजा रही है शंख, रह जीवन की भोर का।।
थकी हुई है देह, इसी लिए मन मौन है।
मुक्ति चाह में नेह, द्वार मुमूर्षा है खड़ी।।
बुझते जाते दीप, अँधियारे से नेह है।
जैसे भगे समीप, पथ मुमूर्षा प्राण है।।
कहें मित्र यमराज, समय पूर्ण हो गया।
अपना कोई काज, नहीं शेष अब तो बचा।।
व्यर्थ विजय की बात, रण से पहले मत करो।
तब सुंदर मृदुगात, सिर्फ लक्ष्य पर ध्यान दो।।
मुझको ये उपहार, नहीं चाहिए आपका।
हमने दिया उधार, जिसे आप कहते फिरो।।
जीवन का उपहार, मातु-पिता की है कृपा।
उनका कर्ज उधार, नहीं उतर सकता कभी।।
करो भेंट उपहार, आया करवा चौथ है।
पत्नी से तकरार, गलती से करना नहीं।।
सामाजिक विस्तार, रिश्तों के संसार का।
ये ईश्वर उपहार, भूल रहे हम आजकल।।
करिए नहीं गुमान, अपने सुंदर रूप का।
रुप-रंग विज्ञान, धूप-छाँव का मेल है।।
करिए नहीं गुमान, अपने सुंदर रूप का।
शील करे गुणगान, सदा सुहागन रूप का॥
कहाँ फँसे हो यार, रूप-रंग के फेर में।
करो नहीं तकरार, बात हमारी मान लो।।
