आओ, आज एक दीप जलाएं
आओ, आज एक दीप जलाएं,
उन वीरों के नाम, जो लौट के घर न आए,
उन सूने आंगनों के नाम,
जहां बरसों से कोई चिराग न जगमगाए।
आओ, आज एक दीप जलाएं,
उन निर्धनों के द्वार, जो जोह रहे हैं बाट,
दीन-दुखियों के जीवन में,
जहां छाई है दुखों की गहरी रात।
आओ, आज एक दीप जलाएं,
गांव की माटी और खेत की मेंड़ पर,
जहां किसान बोता है उम्मीदें,
मिट्टी में अपना पसीना सींच कर।
आओ, आज एक दीप जलाएं,
शिक्षा और असीम ज्ञान का,
दूर करें हम घना अंधेरा,
बेरोज़गारी और हताशा की थकान का।
आओ, आज एक दीप जलाएं,
घर-आंगन महकाएं, खुशियां बिखराएं,
मन का सारा अंधियार मिटाकर,
अंतर्मन में नई ज्योत जगाएं।
— सुनील कुमार महला
