एक देश, कई नंबर प्लेट: जब नौकरी बदलती है तो गाड़ी क्यों फंस जाती है?
पटना का एक लड़का है — संजय। बी.ए. करने के बाद उसे अहमदाबाद की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिली, तो वह अपना बैग उठाकर गुजरात चला गया। वहीं रहते हुए उसने एक पुरानी बाइक खरीदी, गुजरात के नंबर वाली। तीन साल तक वह बाइक उसी से चली, उसी पर वह कंपनी जाता था, उसी पर वह अपने रिश्तेदारों से मिलने जाता था। फिर एक दिन कंपनी ने उसे रायपुर भेज दिया। अब वह छत्तीसगढ़ में रहता है, छत्तीसगढ़ में काम करता है, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर चलता है, पर बाइक अब भी वही पुरानी है और नंबर अब भी वही पुराना है — गुजरात का। अब जब उसे रायपुर में ही बाइक बेचनी है तो खरीदने वाला लड़का रायपुर का ही है, लेकिन बाइक का नंबर गुजरात का है, बेचने वाले का आधार बिहार का है, ड्राइविंग लाइसेंस भी बिहार का है, और सौदा हो रहा है छत्तीसगढ़ में। बताइए इसमें गलती किसकी है? संजय की, जिसने नौकरी के लिए राज्य बदला? या उस खरीदने वाले की, जो रायपुर में रहकर रायपुर में ही बाइक खरीदना चाहता है? गलती किसी की नहीं है, गलती उस सिस्टम की है जो आज भी इस भ्रम में जी रहा है कि आदमी पूरी जिंदगी एक ही जिले में रहेगा, एक ही नौकरी करेगा और एक ही आरटीओ के चक्कर काटेगा, जबकि हकीकत यह है कि आज का हिंदुस्तानी नौकरी, पढ़ाई, शादी और रोजी-रोटी के लिए हर दो-तीन साल में राज्य बदल रहा है और उसका सामान, उसका आधार, उसका मोबाइल नंबर तो उसके साथ चल रहा है, पर उसकी गाड़ी का नंबर वहीं अटका हुआ है जहां उसने उसे पहली बार खरीदा था।
हम बड़े गर्व से कहते हैं कि एक देश, एक बाजार है, एक देश, एक टैक्स है, एक देश, एक पहचान पत्र है। आधार पूरे देश में चलता है, ड्राइविंग लाइसेंस पूरे देश में चलता है, मोबाइल नंबर पूरे देश में चलता है, फास्टैग पूरे देश में चलता है, फिर गाड़ी का नंबर राज्य की सीमा पार करते ही पराया क्यों हो जाता है? कानून कहता है कि अगर आप किसी दूसरे राज्य में बारह महीने से ज्यादा बाइक रखेंगे तो आपको वहां का नंबर लेना होगा, पुराने राज्य से एनओसी लानी होगी, नए राज्य में फिर से टैक्स भरना होगा, फिर से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। कागज पर यह बात ठीक लगती है, क्योंकि सड़क राज्य की है तो टैक्स भी राज्य को ही मिलना चाहिए, लेकिन सड़क पर यह बात मजाक लगती है, क्योंकि बारह महीने का नियम तो बना दिया गया, पर यह कभी नहीं बताया गया कि बारह महीने से कम रहने वाला आदमी यह साबित कैसे करेगा कि वह बारह महीने से कम ही रुका है। मान लीजिए रायपुर में पुलिस ने संजय को रोक लिया और पूछा कि गाड़ी गुजरात की है, तुम रायपुर में क्या कर रहे हो, तो संजय कहेगा कि साहब मैं टूरिस्ट हूं, तो पुलिस वाला कहेगा साबित करो। अब संजय साबित कैसे करेगा? वह बाइक से आया है इसलिए उसके पास ट्रेन का टिकट नहीं है, टोल उसने कैश में दिया था इसलिए फास्टैग की हिस्ट्री नहीं है, पेट्रोल पंप की पर्ची कौन संभालकर रखता है, पीयूसी तो रायपुर में भी बन जाता है उससे क्या साबित होगा, आधार दिखाए तो उस पर बिहार का पता है, लाइसेंस दिखाए तो उस पर भी बिहार का पता है, तो पुलिस वाला कहेगा तुम बिहार के हो, गाड़ी गुजरात की है, रहते रायपुर में हो, तुम हो कहां के? संजय के पास इसका कोई जवाब नहीं है, क्योंकि कानून ने उसे जवाब दिया ही नहीं है, और यही इस कानून की सबसे बड़ी कमजोरी है कि फैसला कागज से नहीं, पुलिस वाले के मूड से होता है, अगर वह मानना चाहे तो मान लेगा कि आप टूरिस्ट हैं, अगर न मानना चाहे तो आप चाहे कितने भी सबूत दे दीजिए, वह कह देगा यह सबूत काफी नहीं है, आरटीओ जाकर बात करो, और आम आदमी आरटीओ जाकर बहस करने से अच्छा दो-चार सौ देकर निकल जाना बेहतर समझता है।
इस देश में सबसे ज्यादा राज्य कौन बदलता है? मंत्री नहीं बदलता, अफसर नहीं बदलता, बड़े उद्योगपति नहीं बदलते। राज्य बदलता है वो मजदूर, जो बिहार से गुजरात फैक्ट्री में काम करने गया, वो नर्स, जो ओडिशा से केरल के अस्पताल में गई, वो सेल्समैन, जो झारखंड से मध्य प्रदेश में सामान बेच रहा है, वो टीचर, जो उत्तराखंड से राजस्थान के प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहा है, और इन्हीं लोगों के लिए कोई सुविधा नहीं है। बीएच नंबर की सुविधा है, पर वो सरकारी नौकरी वालों और बड़ी कंपनियों के लोगों के लिए है, छोटी कंपनी में काम करने वाला, ठेके पर काम करने वाला, अपनी दुकान चलाने वाला आदमी बीएच नंबर नहीं ले सकता, तो उसके पास सिर्फ तीन बुरे रास्ते बचते हैं। पहला रास्ता — कानून मानो, हर बार राज्य बदलने पर पुराने आरटीओ से एनओसी लाओ, नए राज्य में टैक्स भरो, पुराने राज्य से रिफंड के लिए भागो, पचास हजार की बाइक के लिए दस हजार खर्च करो और दो महीने आरटीओ के चक्कर काटो। दूसरा रास्ता — कानून मत मानो, पुराने नंबर पर ही चलाते रहो और हर बार पुलिस को देखकर डरो। तीसरा रास्ता — हर बार बाइक बेच दो, पुराने राज्य में घाटे में बेचो, नए राज्य में फिर पुरानी बाइक खरीदो, हर बार पंद्रह-बीस हजार का नुकसान उठाओ। तीनों रास्ते आम आदमी को ही नुकसान पहुंचाते हैं, और यही वजह है कि आज छोटे शहरों में लोग दूसरे राज्य की नंबर वाली बाइक देखकर ही पीछे हट जाते हैं, बाइक अच्छी हो, कीमत कम हो, फिर भी लोग कहते हैं भैया दूसरे राज्य की है, झंझट होगा, क्योंकि उन्हें पता है कि बेचने वाले की अधूरी कागजी कार्रवाई खरीदने वाले के सिर पर आ जाएगी, और वो भी तब जब खरीदने वाले ने कोई गलती की ही नहीं। संजय की बाइक रायपुर का लड़का खरीदेगा तो उसे गुजरात से एनओसी लानी होगी, पर संजय तो गुजरात छोड़ चुका है, वो एनओसी लाने अहमदाबाद जाएगा क्या, अगर वो नहीं गया तो बाइक का ट्रांसफर अटक जाएगा, और खरीदने वाला रायपुर का लड़का यह नहीं कह सकता कि मैं टूरिस्ट हूं, क्योंकि उसका आधार रायपुर का है, लाइसेंस रायपुर का है, वो रायपुर में ही रहता है।
हमें टैक्स खत्म करने की जरूरत नहीं है, राज्य को सड़क बनाने के लिए पैसा चाहिए, लेकिन तरीका बदलने की जरूरत है, और तरीका बहुत सीधा है। सबसे पहले बीएच नंबर सबके लिए खोल दीजिए, यह कोई वीआईपी सुविधा नहीं होनी चाहिए, जो भी भारतीय नागरिक चाहे उसे बीएच नंबर मिलना चाहिए, नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट, कंपनी बड़ी हो या छोटी, चलने-फिरने का अधिकार सबको बराबर मिलना चाहिए। दूसरे, टैक्स राज्यों के बीच में निपटे, आदमी के बीच में नहीं, जैसे जीएसटी में होता है, गाड़ी एक राज्य से दूसरे राज्य में जाए तो बचा हुआ टैक्स कंप्यूटर से ही एक राज्य से दूसरे राज्य में चला जाए, आदमी को दो बार टैक्स न देना पड़े और रिफंड के लिए साल भर भटकना न पड़े। तीसरे, एनओसी पूरी तरह ऑनलाइन हो, एनओसी के लिए पुराने आरटीओ में जाकर लाइन में लगना बंद हो, आवेदन ऑनलाइन हो, एनओसी सात दिन में ऑनलाइन मिले, रायपुर में बैठा आदमी अहमदाबाद के आरटीओ का चक्कर क्यों काटे। चौथे, टूरिस्ट की साफ परिभाषा हो, कानून में साफ लिखा हो कि टूरिस्ट को साबित करने के लिए डीएल, आरसी, बीमा और पीयूसी के अलावा और कुछ नहीं मांगा जाएगा, अगर राज्य टूरिस्ट की परिभाषा ही नहीं दे सकता तो उसे टूरिस्ट को सजा देने का हक भी नहीं है। और पांचवें, गाड़ी का नंबर देश का हो, जिले का नहीं, जब गाड़ी का सारा रिकॉर्ड — आरसी, बीमा, पीयूसी, चालान — एक ही राष्ट्रीय पोर्टल पर है, तो नंबर प्लेट पर जिले का नाम क्यों, नंबर देश का होना चाहिए। संजय कोई अपराधी नहीं है, वो सिर्फ नौकरी करने के लिए बिहार से गुजरात गया और गुजरात से छत्तीसगढ़ आया, अगर हम अपने नौजवानों से कहते हैं कि जाओ, जहां काम मिले वहां जाओ, देश तुम्हारा है, तो फिर हम उसी नौजवान से यह क्यों कहते हैं कि तुम्हारी गाड़ी सिर्फ एक राज्य की है। सड़क सबकी है, हक सबका है, नंबर भी सबका होना चाहिए।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
