मधुगीति : आए कहाँ हैं आफ़ताब !
आए कहाँ हैं आफ़ताब, रोशनी लिए; रूहों की कोशिका के दिये, झिलमिले किए ! मेघों की मंजु माला, अभी
Read Moreआए कहाँ हैं आफ़ताब, रोशनी लिए; रूहों की कोशिका के दिये, झिलमिले किए ! मेघों की मंजु माला, अभी
Read More‘हँ-सो’ की गंगा में बह कर, हँसों के उर ध्यान किए; आते जाते भाव सिंधु में, स्वर सरिता में मिल
Read Moreभूरे भुवन में छाए हुए, मेघ मधु हुए; जैसे वे धरित्री ही हुए, क्षितिज को लिए ! दिखती धरा कहाँ
Read Moreहर केन्द्र के लखा है वही, आस पास ही; वह प्राण में बसेरा किया, हर लिबास ही ! नज़्मों में
Read Moreआए हो घनश्याम हृदय तुम, मधुरम मधुमय रूप लिए; अभय किए वरदान दिए हो, अप्रतिम अभिनव भाव दिए ! धरा
Read Moreबिन बुलाए कभी चला आता, बुलाने पर भी कभी ना आता; रखता है वह अजीब सा नाता, देख सुन उर
Read Moreउतर आकाश से थे जब आए, कहाँ पहुँचे हैं समझ कब पाए; पूछने पर ही जान हम पाए, टिकट का
Read Moreस्वप्न में जब रहा था मैं, कहाँ इस जगती रहा था; मन की अवचेतन गुफ़ा में, मैं किसी क्रीड़ा रहा
Read Moreचला चलता हृदय हँसता, प्रफुल्लित तरंगित होता; सृष्टि के सुर सुने जाता, इशारे समझता चलता ! धरा धाए मुझे चलती,
Read Moreमधु माधुरी ज़िन्दादिली, उद्यान प्रभु के है खिली; विहँसित प्रखर प्रमुदित कली, जल गगन अवनि से मिली ! बादल बदलते
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