नो बीमा, नो पेट्रोल – अब समझ में आएगा जिम्मेदारी का माइलेज
हम भारतीय बड़े अद्भुत लोग हैं। नियमों का सम्मान करने में नहीं, उन्हें चकमा देने में विश्वगुरु बनने का सपना
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Read Moreसावन की रिमझिम फुहारों में, धरा हरियाली ओढ़े,खेतों की मेड़ों पर जैसे, कोई सपना चुपके से दौड़े।नागपंचमी पावन बेला, भोजली
Read Moreन जेब में सिक्कों की खनक, न नोटों की कोई कतार,मोबाइल उठाया, पिन लगाया, पल में हुआ कारोबार।दस वर्ष पहले
Read Moreअब कहीं प्रधानमंत्री, “चीनी” पर फरमान न दे दें,बढ़ते दामों से जनता को, कोई नव ज्ञान न दे दें।कहें-मीठा कम
Read Moreशिक्षक बोले-“बारिश” का बहाना है, ज़रा देर लगेगी,प्राचार्य कहे-ये ई अटेंडेंस का जमाना एब्सेंट लगेगी। छाता लेकर निकले गुरुजी, राहों
Read Moreनो बीमा, नो पेट्रोल, सड़कों पे फिर कैसा रोल?नियम सबके लिए हैं, क्यों हों उनमें कोई होल?वाहन ले निकल पड़े
Read Moreसमाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों, बढ़ती अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं होती। किसी भी सभ्यता का
Read Moreवहाँ पे खून से लाल हुई जो वर्दी,वह केवल मात्र ‘कपड़ा’ नहीं थी।उसमें एक घर की भी उम्मीद थी,माई की
Read Moreविकास की दौड़ में जब जंगल कट जाते हैं,नदियों के निर्मल दर्पण धुंधले पड़ जाते हैं।कुछ पल का लाभ भले
Read Moreचार दीवारों के भीतर, जब रिश्तों पर ताले लगते हैं,तब सबसे पहले बचपन की मुस्कानें रोती हैं।चार नहीं, साढ़े चार
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