ग़ज़ल
दर्द है ‘हल्का-सा’ मगर हो रहा है,दिल किसी याद में बिखर रहा है। ये रात चुप है, चाँद भी खामोश
Read More1 जुलाई – डॉक्टर्स डे पर विशेष कविता सफेद कोट में “सेवा” का दीप,हरेक पीड़ा में रहते हैं समीप।दिन हो,
Read Moreसुबह की नरम धूप जब आँगन में उतरती है,चिड़ियों की चहचहाहट मन को छूकर गुजरती है।एक प्याली चाय के साथ
Read Moreविश्वास की डोरी टूट गई, सपनों की दुनिया छूट गई,जिस हाथ में मेहन्दी सजनी थी, मृत्यु छाया लूट गई। जिसने
Read Moreकम में खुश रहिए, खुशी कम नहीं होगी,मन की यह दौलत कभी कम नहीं होगी।महलों की चमक से जीवन नहीं
Read Moreवर्तमान में पिताओं में जो परिवर्तन परिलक्षित हुआ हैं। वह एक साहसिक और खुागवार पहलू है। साहसिक उस परिदृश्य को
Read Moreसमुद्री लहरों से लड़ते-लड़ते,जीवन जिनका यूं बीत गया।इस देश की साँसें चलती रहीं,उनका नाम कहाँ पे खो गया। वे सीमा
Read Moreअनजान ‘शहर’ की गलियों में,मैं खुद को ढूँढता फिर रहा हूँ।हरेक चेहरा लगता अपना-सा,फिर भी ‘तन्हा-तन्हा’ रहता हूँ। यहाँ पर
Read Moreगैस, पेट्रोल, डीज़ल के दाम,हर दिन लिखते नए पैगाम।जेब हो रहीं और भी हल्की,जीवन में छा रहीं हैं कड़की। पहियों
Read Moreसत्ता के शिखरों पर जो दीपक जलते थे,आज वही धुएँ में अपने निशान ढूँढ़ते हैं।भीड़ की तालियों से “गूँजते” थे
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