Author: संजय एम. तराणेकर

कविता

मर्यादा न भूल जाना

करिए ‘इज़हार-ए-मोहब्बत’ बाबू-शोना,‘सभ्यता-संस्कृति’ का ‘ध्यान’ रख लेना।पवित्र प्रेम की मर्यादा को न भूल जाना,सच्चे प्यार को ‘सार्वजनिक’ ना बनाना। माना

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कविता

रिश्वतखोरी : शर्मसार करते रिचार्ज

अंतिम सांस गिन रहीं हैं इंसानियत,रिश्वतखोरों की पौ बारह वहशियत।मौत मुनाफे की दुकानों पे नाच रहीं,दुनिया भयानक उत्सव देखती रहीं।

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