तेरा आना
सितंबर… अहा!नवाँ महीना, ऋतु-संधि का सेतु,जहाँ स्मृतियों के दीप जलते हैंऔर मौसमों की परछाइयाँएक-दूसरे से आलिंगन करती हैं। नहीं, इसे
Read Moreसुनता जा, ओ निर्मोही पथिक,क्यों किया तूने हृदय भ्रमित?लोचन अब तुझको ढूँढ रहे,मुझे बिसार कर है क्यों हर्षित? टीस जिया
Read Moreबहुत जी करता हैजी लूँ हर वह क्षण,जब नटनागर रास रचाते थे,मधुर बंसी की तान परसंसार को मोहित कर जाते
Read Moreकहने को तो नागर ने सब कुछ रचा,पर मोहन के जैसा दुख किसने सहा,जन्म लेते ही छूटे निज मात-पिता,इससे बढ़कर
Read Moreतू कहती तेरे गिरधर गोपाल,यह कैसा मायाजाल?नागर को तेरा कहाँ है भान,देख जरा तू अपना हाल। राणा को कर दिया
Read Moreआज एक खयाल आयाऔर दिल को यूँ भा गया,कि हम अक्सर दूसरों की नज़रों मेंअपनी क़ीमत ढूँढ़ते हैं,उनके आँकलन में
Read Moreमेरे इन प्यासी पलकों परख्वाब सुनहरे किसके हैं?क्या वही हैं, जिनकी ख़ातिरहम रात-रात भर सिसके हैं? एक क्षण कभी ऐसा
Read Moreपत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल सभी का जाने हैं,जब तक डाली से जुड़े थे छाँव सरीखे माने हैं। अब जो छूटे समय
Read Moreजो आ जाऊँ तो मूक उधरजाने को कह दूँ तो बेखबर,कैसे समझूँ जज्बात प्रियकिस विध लूँ तेरी थाह प्रिय इठलाती
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