श्रद्धेय महादेवी वर्मा को समर्पित
वेदने तू यह बता देक्यों हृदय है श्रांत तेराचिर विरह की स्वामिनी तूक्यों है मन उद्भ्रांत तेरा।बस क्षणिक भर ही
Read Moreवेदने तू यह बता देक्यों हृदय है श्रांत तेराचिर विरह की स्वामिनी तूक्यों है मन उद्भ्रांत तेरा।बस क्षणिक भर ही
Read Moreजी करता है जाने तुझको, कैसी थी तुम बचपन में।चञ्चल थी या चुप चुप रहती सच कह क्या अंतर्मन में।
Read Moreएक छोटा-सा संदूक पीतल का, पर चमकता सोने-सा।नानाजी-नानीजी ने माँ को दिया थाउनकी शादी के समय आशीष, परंपरा और अपनापन
Read Moreना जाने क्यों, जब भी हरसिंगार की सुवास मेरी साँसों से टकराती है, मेरा मन खिंचा चला जाता है। यह
Read Moreसुनता जा, ओ निर्मोही पथिक,क्यों किया तूने हृदय भ्रमित?लोचन अब तुझको ढूँढ रहे,मुझे बिसार कर है क्यों हर्षित? टीस जिया
Read Moreबहुत जी करता हैजी लूँ हर वह क्षण,जब नटनागर रास रचाते थे,मधुर बंसी की तान परसंसार को मोहित कर जाते
Read Moreकहने को तो नागर ने सब कुछ रचा,पर मोहन के जैसा दुख किसने सहा,जन्म लेते ही छूटे निज मात-पिता,इससे बढ़कर
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