Monthly Archives: June 2014


  • हाइकु

    हाइकु

    1 हुलसी सृष्टि मोरचंग सा बादल रूपोश रवि । == 2 साँवली हवा झुलसी जुही बेला जेठ झमेला । == 3 जीने की कुंजी नर ना हो बानर समृद्ध पूंजी ।

  • कलयुगी पुत्र

    कलयुगी पुत्र

    एक बूढी औरत , कुम्भ के मेले में बैठी रो रही थी । वह बहुत परेशान लग रही थी और बार बार यही बात दोहरा  रही थी ” नहीं… मेरा बेटा जरूर आएगा… वो मेरे साथ...

  • दिल्लगी करते रहे

    दिल्लगी करते रहे

    यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे ज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ ख्वाब कि गलियों में जो आवारगी करते रहे बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर इस तरह...

  • सेहत, सबके लिए

    ( पहले देखिए  शाँति, सबके लिए ) मज़दूरी, खेती, व्यापार और फ़ैक्ट्रियों में प्रोडक्शन, हम इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते, अगर समाज में शाँति नहीं है। अगर लोग शाँति के साथ सड़कों पर आ-जा नहीं...

  • गाँव से एक दिन शहर को

    गाँव से एक दिन शहर को

    सागर की लहरों पर कदम बिछाकर आये थे हम यूँ गाँव से एक दिन शहर को आये थे बहुत छोटी सी एक थाली थी किनारों वाली अपनी आरजु के सारे महताब भर आये थे तुलसी की...