कविता

लड़कियों के ऊपर भी गुंडई छाई

क्या जमाना आ गया है लोकलाज शर्म हया नहीं है अब कुछ यहाँ लड़कियों ने ऐसा कर्म किया लड़कों को भी है मात दिया कर रही है अब तो गुंडागर्दी गालिया दे रही है भद्दी से भद्दी हाथ उठा ठुकाई कर रही है गुंडई के रास्ते पर कदम धर रही यह भी देखो अब ढिठ […]

कविता

इक फूल खिला है ग़ालिब

बेहद बेहतरीन शायर ग़ालिब  के 217 वें जन्मदिवस पर कही जो बर्फ पड़ी है लगता हैं ठंड बड़ी है हवा का रुख भी है बदला हुआ मौसम भी है महका हुआ कलियों में होने लगी है गुफ्तगू भला आज चमन क्यूँ है बहका हुआ तभी एक कली ने दूसरी से कहा इक़ फूल खिला है *ग़ालिब* जो हरदिल अज़ीज़ […]

हाइकु/सेदोका

हाइकु

  1. तू दूर नहीं मेरे पास है मां तू मुझमें कहीं. 2.शुक्रिया तेरा मेरे दोस्त तूने जीना सिखाया. 3.भूल न जाना मां की कुर्बानियां तू कर्ज़ चुकाना. 4.बतादे जरा तुझे लाऊं कहां से समझा ज़रा. 5.रख हौसला तिनके सहेज ले बना घोंसला    

संस्मरण

मेरी कहानी – 29

जब हम छठी क्लास में पड़ते थे तो हमें पता था कि इस गाँव के स्कूल में हमारा आख़री साल था और इस के बाद हमें प्लाही पड़ने जाया करना था, इसलिए हमें कुछ चिंता थी कि हमें इतनी दूर रोज़ पैदल चल कर जाना होगा। कभी कभी गाँव के कुछ लोग जिनमें डाक्टर सोहन […]

कुण्डली/छंद

ताजी खबर : ताजी कुंडलिया

गरमी का पारा गया,सीमा को कर पार। मरे सैकड़ों आदमी,चहुँ दिश हाहाकार। चहुँ दिश हाहाकार,हाल हैं खस्ता सबके। पशु-पक्षी-इंसान,हार माने हैं कब के। कह ‘पूतू’ कविराय,न बरते थोड़ी नरमी। करती अत्याचार,दिनोदिन जालिम गरमी।। पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’

कविता

कविता

है व्यथित ये मन हमारा और तड़पता प्यार साथी हो सके तो कर लो अब स्वीकार मेरा प्यार साथी प्यार की परिभाषा न कोई न कोई सिद्धांत साथी है फ़कत लिक्खा हुआ है ढाई आखर प्रेम साथी राधा हो या हो की मीरा पाया सबने प्यार साथी चल मेरे तू साथ में अब दूंगा सच्चा […]

कविता

क्या है जिंदगी !

कभी समंदर उठते सैलाबों का, कभी एक ज़लज़ला ,कभी आग से जलते हुए सहरा सी है यह ज़िंदगी, फिर भी हंस हंस के ज़ी ले, यह खुदा की इनायत है, एक बार मिलने वाली, किसी की अमानत है ज़िंदगी, तेरे हर सुकर्म पर तेरे ही आगे झुकती है ज़िंदगी तेरे हर दुष्कर्म पर तुझ को […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर का यथार्थ स्वरूप

ओ३म् ईश्वर किसे कहते हैं। ईश्वर इस संसार वा ब्रह्माण्ड को बनाने वाली सत्ता को कहते हैं। वही सत्ता इस संसार को बनाकर इसका संचालन करती है तथा इस सृष्टि की आयु वा अवधि पूर्ण होने पर इसका संहार या प्रलय करती है। हमारी आंखों के समाने यह सारा संसार प्रत्यक्ष है। इसमें किसी को […]

कविता

पारिवारिक यथार्त हास्य[कविता]

[पारिवारिक यथार्त हास्य ] पति बोला पत्नी से बड़ी उम्र है तेरी / याद अभी मै कर रहा मिस काल मे न की देरी,// मेरे बच्चों की प्यारी मम्मी हो कितनी अलबेली /// सूरज चंदा और सितारे गुणगान करत हैं तेरी,,//// गुलशन के गुल-गुल मे बसता प्यारा नाम तुम्हारा ,/// संभल कर रहना गोरी तुम […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

प्रियतम तेरी याद है आई बहुत दिनों के बाद मुझको सारी रात जगाई बहुत दिनों के बाद सर्द हवा आई मेरे दिल को छूकर चली गई लगा तेरा स्पर्श कराई बहुत दिनों के बाद