गीतिका/ग़ज़ल

बसंत रुत आ गई

लो बसंत रुत आ गई हां बसंत रुत आ गई पीली पीले सरसों फूले पुरवाई बहका गई। फूल फूल पर कितनी झूमे भंवरा गुनगुन गाए बेर लगे बेरीयों में और अमराई बौरा गई। नव कोपल से सजी शाखाएं मंद मंद कलियां मुस्काएं रंग बिरंगे फूल खिले मौसम पे जवानी छा गई। हरे हरे पत्तों में […]

गीत/नवगीत

होली

होली का त्यौहार है रंगो की बौछार है रंग बिरंगी रंगों में रंग गया संसार है। रंग भरी पिचकारी ले आई मस्तों की टोली गली गली में शोर मचा आ जाओ हमजोली आओ रंग गुलाल लगाकर खेलें आंख मिचोली होली का त्योहार है रंगों की बौछार है रंग बिरंगी ही रंग में रंग गया संसार […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वह आज हम से यूं मिल रहे हैं जैसे चराग आंखों में जल रहे हैं। मुझे एक मुद्दत से थी मोहब्बत वह भी मोहब्बत में ढल रहे हैं। ये उनके हाल ए वफा से जाना अब वो धीरे-धीरे बदल रहे हैं। हम तुमसे फिरसे न कह सकेंगे अश्क आंखों में फिर पिघल रहे हैं। कहो […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बेशर्म थी वो तुम तो शर्म कर ही सकते थे दामन में उसके इज्जतें भर भी सकते थे। माना के बेबसी में वो बदन बेचती रही समझौता हालातों से तुम कर भी सकते थे। लाज शर्म की उसने तुम्हें पतवार सौंप दी रहमो करम की उसपे नजर कर भी सकते थे। रिश्ता बनाके उसका तुम […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इरादा मोहब्बत का नाकाम आया है राहें अपनी जुदा हुई हैं वो मकाम आया है। सुना है दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता मेरे दुश्मनों में दोस्तों का ही नाम आया है। वो ख़त जो हमने लिखेथे उनको बेकरारी में जवाब में हमारी मौत का फरमान आया है। गुनाह ए इश्क दोनों ने […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

खुदा ने की है साजिश मेरी हस्ती मिटाने की दुआ नाकाम हों जैसे यहां सारे जमाने की। हंसते-हंसते ही हम खाक में मिल ही जाएंगे बाद मरने के जाएगी ये आदत मुस्कुराने की। जो कहना चाहते थे हम उनसे कह नहीं पाए कुछ दिन से हालत है मुझे सब भूल जाने की। हम अपने ख्वाब […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मर्यादा में प्रेम निभाना ये मुझे सिखाया है तुमने प्रेम है पूजा प्रेम तपस्या ये मुझे बताया है तुमने । प्रेम कोई उपहार नहीं है रुह से रुह का बंधन है प्रेम तो है एक मौन समर्पण ये समझाया है तुमने। जिस्म का मिलना मिलन नहीं ये तो एक तमाशा है मन से मन का […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मैं स्याही की बूंद हूं जिसने जैसा चाहा लिखा मुझे मैं क्या हूं कोई ना जाने अपने मन सा गढा़ मुझे। भटक रही हूं अक्षर बनकर महफिल से वीराने में कोई मन की बात न समझा जैसा चाहा पढ़ा मुझे। ना समझे वो प्यार की कीमत बोली खूब लगाई है जैसे हो जागीर किसीकी दांव […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मुझे न दौलत की जुस्तजू है न तख्त ओ ताज की आरजू है फकीर हूं मैं फकीर दिल है यूं फकीरी में साथ चल सकोगे। के सीखा है हमने मुस्कुराना मुझे न गम ना खुशी की परवाह मेरी जिंदगी है धूप छाया क्या ऐसे मौसम में ढल सकोगे। यूं दरबदर हम भटक रहे हैं न […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ये कुदरत का कहर है या किस्मत का असर है कोई दीवार न छत है लोग कहते हैं ये घर है । कोई बहार इस तरफ कभी नहीं आती बदल रहा है जहां मुफलिसी नहीं जाती जल रही है जिंदगी रेत सी तो जलने दो छत नहीं है मुझको बरसात का डर है। कितना मासूम […]