नवीनतम लेख/रचना


  • घर…

    घर…

    थक के चूर जब भी होता हूँ कभी तेरी यादों की दीवारों से लगके सो जाता हूँ मैं..! अहसासों के झरोखों से घूमती तेरी खुशबु तेरे होने का एहसास कराती मुझको कोई झरोखा न लगाया मैंने..!!...

  • वक़्त

    वक़्त

    वक़्त मुझको मैं वक़्त को गुजारता ही गया आईने में खुद को ऐसे उतारता ही गया मेरी आँखों से हटा जो भरम का परदा यारो टूटकर बिखरे हुए मैं ख्वाब सवारता ही गया   मेरी साखों...



  • ग्लेशियर का दर्द

    ग्लेशियर का दर्द

    ग्लेशियर को कहते हैं वो बढ़ाता है मान घाटियों का फिर नदी का फिर समुद्र का पर क्या कभी किसी ने पूछा है उससे क्या-२ गुजरती है उस पर जब चलता है वो पग-पग धीरे-धीरे पिघलता...

  • कविता : कागज

    कविता : कागज

    वो पुर्जे जो कागज़ के हैं भीग गए किसी की याद के टूटे किस्से थे वो मेरे दिल के टुकड़े थे शायद शायद वो जिंदगी के हिस्से थे आज उन किस्सों को दफनाकर वो मेरे दिल...

  • कुंडलियाँ

    कुंडलियाँ

    १ कठिनाई के सामने, झुके न जिनके माथ। जोड़े हैं उनको सदा, क़िस्मत ने भी हाथ।। क़िस्मत ने भी हाथ, बढ़ाकर दिया सहारा मंज़िल ने ख़ुद राह, दिखाकर उन्हें पुकारा खिले ख़ुशी के फूल, सरस बगिया...


  • दर्द की गठरी

    हां मैने सोचा था कि फिर आऊंगी लौटकर तुम्हारे पास कुछ नए दर्द लेकर …. !! पर जब तक जुदा रही तुमसे बहुत से दर्द गहरे अंतस तक उतर आए,.. औरजब तुमसे मिलने आने के लिए...

कविता