धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मेरे जीवन का एक अनुभव


अपने जीवन में छात्रावस्था में मुझे तमिलनाडु एवं मध्य प्रदेश दोनों प्रदेशों में पढ़ने का अवसर मिला। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण आपको एक अनुभव बताना चाहता हूँ। तमिलनाडु में लोग बीमार मरीज को हस्पताल से जबरन छुट्टी करवा कर  चर्च ले जाकर प्रार्थना करवाते हैं जबकि मध्यप्रदेश में  लोग बीमार मरीज को हस्पताल से जबरन छुट्टी करवा कर तांत्रिक के यहां पर झाड़ा लगवाने  जाते हैं।

आम लोगों की भाषा में दोनों अन्धविश्वास हैं मगर दोनों में भारी अंतर हैं। मध्यप्रदेश के लोग अनपढ़ता एवं अज्ञानता के कारण अन्धविश्वास के फलस्वरूप तांत्रिक के पास जाते हैं जबकि तमिलनाडु में लोग पढ़े लिखे होने के बाद भी चर्च जाकर प्रार्थना से चंगाई रूपी अन्धविश्वास को मानते हैं। अनपढ़ता के वश अंधविश्वास का सहारा लेना अज्ञानता का प्रतीक हैं जबकि शिक्षित होने के  बाद भी अन्धविश्वास का सहारा लेना मूर्खता का प्रतीक हैं।

अज्ञानी व्यक्ति में सुधार की निश्चित सम्भावना हैं जबकि मुर्ख व्यक्ति में चाहे जितना जोर लगा लो वह कभी बदलना नहीं चाहता हैं। खेद हैं की अपने आपको ज्ञानी, विज्ञानी, तर्कशील, नास्तिक, साम्यवादी वगैरह वगैरह कहने वाले केवल अज्ञानी लोगों के अन्धविश्वास को उजागर कर चर्चित होने में प्रयासरत रहते हैं जबकि शिक्षित लोगों  के विषय में रहस्यमय मौन धारण कर लेते हैं।

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डॉ विवेक आर्य

3 thoughts on “मेरे जीवन का एक अनुभव

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    विवेक भाई , मेरा मानना है कि यह अंधविश्वास हमारे खून में है . कारण ? बचपन से ही जैसे हम बच्चों को पोलियो के ड्रॉप देते हैं इस तरह पहले उस की जनम कुंडली बनवाने के लिए बेताब हो जाते हैं , फिर जोतिषी जो भी मिले उस से हाथ की रेखाएं दिखाने पर धियान देते हैं , पाप पुन के चक्कर में पता नहीं कितने कर्म काण्ड करवाते हैं जिस का फैदा सिर्फ उन लोगों को ही होता है जिस की रोज़ी रोटी ही यह धंदा है . बच्चों को कहानिआन ही धार्मिक सुनाते हैं जिन में अच्छी बातों को छोड़ कर वहमों भरमों की बातें ही की जाती हैं . जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है धर्म आस्थानों में जाना शुरू हो जाता है . फिर अगर पड़ा लिखा महात्मा हो जिस ने धार्मिक ग्रन्थ पड़े हों तो बात बनती है लेकिन बहुत दफा कम पड़े लिखे धार्मिक लोग लोगों को गुमराह कर देते हैं , जैसे मिडिया में ख़बरें आती रहती हैं . बस यह सिलसिला जारी रहता है और आगे की संतान में आ जाता है . जो लोग जैसे रैशनल लोग आवाज़ उठाते हैं तो उन के खिलाफ हो जाते हैं . धबोलकर की मिसाल सामने है . यह अंधविश्वास नहीं जाएगा . हमारे घर आज तक किसी ने कोई कर्म काण्ड नहीं किया , ना किसी बाबा को पैसा दिया , हाँ हम सभी चैरिटी को देते हैं . कुछ दिन हुए आइस बकेट चैलेंज हो रहा था जो ए एल एस बीमारी की रीसर्च के लिए हो रहा था , हमारे बच्चों ने सौ पाऊंड इक्कठा किया . यह पैसा अगर इस बीमारी के इलाज के लिए कामयाब हो जाए तो यह सारी दुनीआं के भले के लिए होगा नाकि बाबा संतों का पेट भरने के लिए . काश ! लोग दान के अर्थ समझ पाएं .

    • विजय कुमार सिंघल

      मैं आपसे सहमत हूँ, भाई साहब. दान वहीँ देना चाहिए जहां उसका सदुपयोग समाज की भलाई के लिए हो. हरामखोरों और ऐयाशों को दान देना पाप है.

  • विजय कुमार सिंघल

    आपका अनुभव सोचने को बाध्य करता है. ऐसा हम सब रोज ही देखते हैं और अपने तरीके से विरोध भी करते हैं, पर लोग हैं कि समझना ही नहीं चाहते. अन्धविश्वास या मूर्खता की जड़ें बहुत गहरी हैं.

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