करवा चौथ पर एक हास्य कविता
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| वैसे तो यह पति नाम का प्राणी होता है बड़ा तुच्छ, |
| पर करवा चौथ के दिन तो पत्नी के लिए है ‘सब कुछ’, |
| बात बात पर पत्नी की जली कटी सुनते हैं उसके कान |
| पर करवा व्रत के दिन तो कानो में गूंजती है यही तान — |
| तुम्ही मेरे मंदिर , तुम्ही मेरी पूजा, तुम्ही देवता हो, |
| तुम्ही देवता हो, — |
| पति पत्नी के जीवन में हर साल आता है यह प्रसंग , |
| क्या इस से ज़ालिम भी हो सकता है कोई और व्यंग्य , |
| फिर भी पति मज़बूरी में अपना पूरा कर्तव्य निभाता है. |
| अपनी हैसियत से बढ़कर पत्नी के लिए उपहार लाता है, |
| घर गृहस्थी चलाने के लिए पति कितना भी उलझा रहे, |
| काम और नौकरी के चक्कर में, खुद भूख प्यास भूला रहे, |
| फिर भी दुनिया उसके इस बलिदान से बिलकुल अनजान है, |
| पर पत्नी का एक दिन भूखा प्यासा रहना कितना महान है, |
| चलो एक दिन ही सही ,आज के दिन तो पति ही स्वामी है, |
| उस की दीर्घायु की कामना ही पति के लिए स्वाभिमानी है, |
| फिर एक दिन में ही बदल जाता है सब कुछ — |
| और पति रह जाता है वही अदना सा एक प्राणी तुच्छ ,- |
| (सभी सुहागनों को क्षमायाचना के साथ और सभी पतियों को सहानुभूति सहित) |
हा…हा…हा…हा…. पढ़कर मजा आ गया. आपने सही लिखा है.