कविता

कविता : रूठ गया मैं जिंदगी से

रूठ गया मैं जिंदगी से,
जब टूट गए मेरे सपने।
हर चेहरा लगता पराया,
जब छूट गए मेरे अपने।

आस न बची है अब जीने की,
जिंदगी बेगानी सी लगती है।
इस कदर तनहा हो गया हूँ,
अब मौत ही अपनी लगती है।

खेल ऐसा खेला किस्मत ने,
मुझे मात मिली है।
जखम इतने गहरे हैं,
जिन्हें ठीक करने की
दवा भी न मिली है।

विकाश सक्सेना

One thought on “कविता : रूठ गया मैं जिंदगी से

  • विजय कुमार सिंघल

    कविता अच्छी है, पर आपमें ऐसा निराशावाद नहीं होना चाहिए. जिन्दगी से रूठने का कारण क्या है?

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