कविता

खुल्ला

खुली जुबान आती जाती

बिन सोचे शब्दों के कमान

निकल गए लफ्ज़ों के तीर

खींच गयी थोड़ी

गुमशुम बैठी मन की तस्वीर

इन रास्तों पर क्यों चले

बिन चाभी के खुलते ताले

दरवाज़ो पर भीतर की कुण्डी

रिश्तों की ये कैसी गाँठ

खाली घर बिखरे सामान

उठा ले जाए आते मेहमान

रंगो की औकात न जानें

निकल पड़ी गुस्से की साथी

चीटी भागी थक गयी हाथी

खुली जुबान आती जाती ।

प्रशांत कुमार पार्थ

प्रशान्त कुमार पार्थ

प्रशांत कुमार पार्थ (कवि एवं सृजनात्मक लेखक ) पटना, बिहार Contact :- prshntkumar797@gmail 8873769096 नोट:- विभिन्न पत्रिकाओं एंव प्रकाशन में सम्मिलित की गई मेरी कविताएँ :- 1.अंतराष्टिय हिंदी साहित्य जाल पत्रिका 2. मरूतृण साहित्यक पत्रिका 3. अयन प्रकाशन 4. भारत दर्शन साहित्यिक पत्रिका 5. होप्स मैगजीन 6. सत्य दर्शन त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 7. जनकृति अंतराष्टिय हिंदी पत्रिका

2 thoughts on “खुल्ला

  • राज किशोर मिश्र 'राज'

    अतीव सुंदर सृजन”

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    सुंदर रचना

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