गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : जब कली को मुस्कुराना आ गया

जब कली को मुस्कुराना आ गया|
जान लो मौसम सुहाना आ गया ||
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पंछियों की डार आई ही नहीं |
बोल दो गेहूं में दाना आ गया ||
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फेसबुक पर आ पड़ोसी ये कहे |
आप को मल-मल नहाना आ गया ||
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काग कहता है अरी सुन री सखी |
नोच खाने का जमाना आ गया ||
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लाख सोचे खर्च करने को अगर |
लाडले को भी कमाना आ गया ||
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साँप को रस्सी समझ मंजिल चढ़े|
शर्तिया कोई दीवाना आ गया ||
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लाट बन के ही सदा फिरते रहे |
पेट बोला हल चलाना आ गया ||
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साल सोलहवां ये मयखाना हुआ |
आँख से पीना पिलाना आ गया ||
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इश्क से बढ़कर कोई उस्ताद क्या
दस्त से खाना खिलाना आ गया ||
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आप से सच ही कहा आलोक ने |
प्यार में रोना रुलाना आ गया ||

आलोक अनंत 

अनन्त आलोक

नाम - अनन्त आलोक जन्म - 28 - 10 - 1974 षिक्षा - वाणिज्य स्नातक शिक्षा स्नातक, पी.जी.डी.आए.डी., व्यवसाय - अध्यापन विधाएं - कविता, गीत, ग़़ज़ल, हाइकु बाल कविता, लेख, कहानी, निबन्ध, संस्मरण, लघुकथा, लोक - कथा, मुक्तक एवं संपादन। लेखन माध्यम - हिन्दी, हिमाचली एंव अंग्रेजी। विशेष- हि0प्र0 सिरमौर कला संगम द्वारा सम्मानित पर्वतालोक की उपाधि - विभिन्न शैक्षिक तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा अनेकों प्रशस्ति पत्र, सम्मान - नौणी विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान व प्रशस्ति पत्र - दो वर्ष पत्रकारिता आकाशवाणी से रचनाएं प्रसारित - दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित - काव्य सम्मेलनों में निरंतर भागीदारी - चार दर्जन से अधिक बाल कविताएं, कहानियां विभिन्न बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित प्रकाशन - तलाश (काव्य संग्रह) 2011 संपर्क सूत्र - साहित्यालोक, बायरी, डा0 ददाहू, त0 नाहन, जि0 सिरमौर, हि0प्र0 173022 9418740772, 9816642167