धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

पं. आर्यमुनि के अनेक अलभ्य ग्रन्थों में एक दयानन्द-चरित-मानस

ओ३म्

 

पं. आर्यमुनि जी आर्यसमाज के शीर्षस्थ विद्वानों में से एक रहे हैं। महर्षि दयानन्द जी के परलोकगमन के बाद उन्होंने महर्षि के ऋग्वेद भाष्य का सातवें मण्डल के उस मन्त्र से भाष्य आरम्भ किया जहां पर वह छूट गया था। आपने ऋषि शैली पर ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य पूरा कर उसके बाद आठवें व नवम मण्डल का भाष्य भी किया। दर्शनों व उपनिषदों पर भी आपने भाष्य किया और रामायण व महाभारत पर टीकाओं सहित भीष्म पितामह के इतिहास आदि जैसे अनेक ग्रन्थ भी लिखे। रामचरित मानस की तर्ज पर आपने ऋषि का काव्यमय जीवनचरित लिखना आरम्भ किया था। इस हिन्दी काव्यमय जीवनचरित का उल्लेख आर्यजगत के वयोवृद्ध विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय ने अपने विस्तृत लेख स्वामी दयानन्द के जीवनपरक हिन्दी महाकाव्य’ में किया है जो रामलाल कपूर ट्रस्ट की मासिक पत्रिका वेदवाणी के ‘‘दयानन्दविशेषांक-8’’ (सम्पादक पं. युधिष्ठिर मीमांसक) के रुप में जनवरी, 1992 में प्रकाशित हुआ था। इसी लेख से दयानन्द-चरित-मानस शीर्षक से दिया गया विवरण आज हम पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहें हैं।

 

डा. भारतीय जी ने लिखा है-‘‘स्वामी दयानन्द की जन्म शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित दयानन्दचरितमानस संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् महामहोपाध्याय पं. आर्यमुनि की एक उत्कृष्ट काव्य कृति है। खेद है कि इसका प्रथम खण्ड जन्मकाण्ड ही लिखा जा सका जो 1981 वि. (1925 .) में बी.एल. पावगी के हितचिंतक प्रेस काशी में मुद्रित होकर प्रकाशित हुआ था। पं. आर्यमुनि का जन्म पटियाला राज्य के रुमाणा ग्राम में हुआ था। इनका अध्ययन काशी में हुआ, जहां ये स्वामी दयानन्द के प्रत्यक्ष संपर्क में आए। इनका जन्म का नाम मनिराम था, किन्तु कालान्तर में ये आर्यमुनि के नाम से प्रसिद्ध हुए। पं. आर्यमुनि संस्कृत और शास्त्रों के प्रौढ़ विद्वान् थे। इन्होंने कई वर्षों तक डी..वी. कालेज लाहौर में संस्कृत और दर्शनशास्त्र का अध्यापन किया था। उपनिषद्, दर्शन, गीता आदि अधिकांश शास्त्र ग्रन्थों पर इन्होंने विस्तृत आर्यभाष्य लिखे हैं।

 

पं. आर्यमुनि को काव्यरचना करने का शौक था। फलतः वे अपने शास्त्रीय ग्रन्थों में भी यत्र तत्र पद्य रचना कर देते थे। दयानन्द चरित मानस गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित-मानस की शैली में लिखी गई एक मनोहारी काव्य कृति है। दोहा चैपाई शैली में निबद्ध इस काव्य में स्ंस्कृत के तत्सम शब्दों का भूरिशः प्रयोग हुआ है। ग्रन्थारम्भ में कवि निराकार परमात्मा की स्तुति करते हुए लिखता है–

 

बन्दौ प्रथम अनीह अनामा।

जासु भजै सुधरे सब कामा।।

 

देस काल वस्तु कृत भेदा।

त्रिविध भेद कृत नहिं परिछेदा।।

 

मुनि मुनीश जहं पार न पावा।

मनमति अल्पविषय किमि आवा।।

 

कोटि कोटि नभ मण्डल तारे।

कौन गने नहिं जाय विचारे।

 

निगमागम जिहिं पार न पावा।

अगम अगाध प्रभू की माया।।

 

पं. आर्यमुनि की यह काव्यरचना तत्कालीन पटियाला राज्य के बरनाला नामक कस्बे में लिखी गई थी। काव्य रचना के काल तथा स्थान का उल्लेख कवि ने ग्रन्थान्त में दोहों में इस प्रकार किया है–

 

पटियाला शुभ राज्य में बरनाला जिहि नाम।

तिहिं में मुनि प्रस्तुत कियो महाकाव्य को काम।।

शासन श्री भूपेन्द्रहरि पाय कथा यह ज्ञान।

संवत ग्रह विधु विक्रमी एक अशीति जान।।

 

इन पंक्तियों का भाव यह है कि पटियाला राज्य के बरनाला नामक स्थान में कवि ने महाराजा भूपेन्द्रसिंह के शासन काल में 1981 वि. में इस काव्य का प्रणयन किया था।

 

पं. आर्यमुनि ने स्वामी दयानन्द की प्रशस्ति में फुटकर सवैये भी लिखे हैं। ऐसे ही आठ सवैयो को ‘‘दयानन्द चित्रावली” में संगृहीत किया गया है। सरल एवं प्रसादपूर्ण शब्दावली में निर्मित यह सवैया पं. आर्यमुनि के काव्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है

 

धन्य भई उनकी जननी जिन भारत आरत के दुःख टारे।

रवि ज्ञान प्रकाश किया जग में तब अन्ध निशा के मिटे सब तारे।

दिन रात जगाय रहे हमको दुःखनाशक रूप पिता जो हमारे।

शोक यही हमको अब है जब नींद खुली तब आप पधारे।।”

 

हमने यह सामग्री इस लिये प्रस्तुत की है कि इसके माध्यम से हम बता सकें कि पं. आर्यमुनि द्वारा लिखा गया दयानन्द चरित मानस ग्रन्थ बहुत लम्बी अवधि से अप्राप्य है। हमनें इस ग्रन्थ को कभी नहीं देखा। इसका नाम ही पंडित जी के संक्षित परिचय व इस लेख में पढ़़ा है। धीरे धीरे हमारा पुराना साहित्य अप्राप्य वा विलुप्त होता जा रहा है। पुराने विद्वानों जैसे विद्वान अब हैं नहीं परन्तु उनका साहित्य भी हम आर्यों की उपेक्षा से अनुपलब्ध है। आर्यसमाज में अनेक उत्सव, आन्दोलन व योजनायें बनती हैं परन्तु हमने कभी पुरोने विद्वानों के दुर्लभ महत्वपूर्ण साहित्य के पुनप्रकाशन विषयक किसी योजना व प्रस्ताव पर विचार होते नहीं देखा। आर्यसमाज में लाखों व करोड़ो सदस्य हैं, अधिकांश सम्पन्न व समृद्ध हैं, कुछ करोड़पति व अरबपति भी हैं, यदि वह थोड़ा सा भी ऋषि भक्ति च आर्यसमाज के प्रति अपने प्रेम का परिचय दें, तो दुर्लभ अप्राप्य साहित्य की रक्षा हो सकती है। धनाभाव ही साहित्य के प्रकाशन का प्रबल शत्रु है। हम अनुभव करते हैं कि सभाओं व सभी समाजों को अपने बजट का 15 से 25 प्रतिशत धन दुर्लभ और महत्वपूर्ण साहित्य के पुनरुद्वार पर व्यय करना चाहिये। यदि ऐसा न हुआ तो आने वाली पीढ़ियां हमारे पुराने ऋषियों के समान उच्च कोटि के विद्वानों के महत्वपूर्ण साहित्य से वंचित हो जायेंगीं। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य