कविता

प्यार..

ओह्ह् प्यार
कर देता अँधा सबको
मिट जाते सभी फासले
पार कर देते सभी हदे
बस प्यार को ही अहमियत देते
खैर प्यार तो प्यार ही होता है
बशर्ते सच्चा प्यार होना चाहियें
ये झुठ मुठ का प्यार
सच्चे प्यार को बदनाम कर बैठा है
करते है प्यार के नाम पर जलील
एक दूसरे को और
प्यार का नाम देते है
जब प्यार की परिभाषा पता ही नही
तो क्यो झुठा प्रेम को प्यार कहते है
एक दूसरे का जीवन
क्यो बरबाद करते है
आज कौन सच्चा प्यार करता है
बस एक दिखावा मात्र करता है
हमने सुना है जहॉ प्यार होता है
वहॉ नफरत भी
इसका मतलब ये नही कि
नफरत मे किसी का जिंदगी
बर्बाद करना होता है
आज तो बस यही होता
भले प्यार का नाम होता है|
    निवेदिता चतुर्वेदी

निवेदिता चतुर्वेदी

बी.एसी. शौक ---- लेखन पता --चेनारी ,सासाराम ,रोहतास ,बिहार , ८२११०४

One thought on “प्यार..

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    सही बात ,आज पियार दिखावा ही है . पुराना ज़माना अच्छा था .माता पिता ने रिश्ता तय कर दिया और सारी जिंदगी इकठे रह कर गुज़ार दी .बच्चे होते ,पोते पोतीआं होते ,सारे रिश्तेदार होते और शादी समारोहों पर सभी इकठे होते, एक मज़ा सा आ जाता .आज तो इंटरनेट पे पियार और इन्टरनेट पे जवाब .छोटा सा झगड़ा हुआ और बच्चे इस में पिस कर रह जाते हैं . हमारी सगाई हमारे दोनों के दादाओं ने तब तय की थी ,जब मैं बारह वर्ष का था और अर्धांगिनी नौ वर्ष की .मैं २४ का हुआ ,पत्नी १९ की ,तो शादी हो गई .४९ साल हो गए शादी हुई को .पोते पोतीआं और दोहते दोह्तीआन हैं , सभी इकठे हो कर हमारा जनम दिन मनाते हैं और भविष्य कैसा होगा ,यह दीख ही रहा है लेकिन जो भी हो रहा है ,अच्छा नहीं हो रहा .आप की कविता से कुछ इमोशनल हो गिया .

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