लघुकथा

लघुकथा : तीसरे के चावल

संयोगवश शहर में एक ही दिन जालिम सिंह व धर्मचंद की मृत्यु हो गई । जालिम सिंह एक नम्बर का दुष्ट व कई हत्याओं में शामिल व्यक्ति था । वह अपने जीवन के कई वर्ष जेल में बिता चुका था । उसके ठीक विपरीत धर्मचंद एक पूण्य -आत्मा , सदाचारी एवम् परोपकार की साक्षात मूर्ति थे । जब एक ही दिन दोनों की मृत्यु हुए तो एक ही दिन उनका तीसरा भी था । शमशान में तिया करने वालों की भीड़ थी । अतं में रीति के अनुसार पके हुये चावलों को कौवा आकर खावे तब तीये की प्रक्रिया पूरी समझी जाती अत: दोनों के परिजन कौवों का इन्तज़ार करने लगे । तब ही अचानक एक कौवा कहीं से उडता आया और जालिमसिंह की राख के ढेर के पास पके चावलों को चोंच में भर कर उड़ गया ।

ये देख कर सभी दंग रह गये । इसके बाद फिर एक भी कौवा वहाँ नहीं आया । बहुत देर प्रतिक्षा कर सभी वहाँ से चले गये । पर धर्म चंद के श्रेष्ठ व सदाचारी जीवन पर कौवे वाली घटना ने उस दिन प्रश्न-चिह्न सा लगा दिया । इस घटना की चर्चा कई महिनों चली कि क्या संयोगवश शमशान में कौवे के न आने व चावल न खाने से क्या किसी व्यक्ति की भलाई , बुराई में बदल सकती है और खाने पर बुराई, भलाई में । ये प्रश्न , सभी शहर वासियों को आज भी मन ही मन परेशान करता रहता है…

विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,स.मा. (राज.)322201