गीतिका/ग़ज़ल

ये दिल……गजल

गया है हार उस जालिम से अब फरियाद करके दिल ।
न जाने क्यूँ तड़पता फिर उसी को याद करके दिल ।

कि जिसके नाम हमने तो सभी अपनी खुशी लिख दी ।
मगर वो अश्किया मेरा गया नाशाद करके दिल ।

नज़र साया चुराने अब लगा खुद का ही खुद से क्यूँ ।
वो अपने अक्स से ऐसे गया आबाद करके दिल ।

मैं सजदा कर रही उस वक्त का जब तुम मिले दिलबर ।
मिले अख़लाक से या फिर मिले उफ्ताद करके दिल ।

न हटतीं है निगाहें वो गया जिस राह पर *गुंजन* ।
नमी आँखों गया है दर्द को आजाद करके दिल ।

हमें बुत की तरह जो था मिला हमने मुहब्बत से ।
उसे हँसना सिखा डाला सुनो ईजाद करके दिल ।

गुंजन ‘गूँज’

गुंजन अग्रवाल

नाम- गुंजन अग्रवाल साहित्यिक नाम - "अनहद" शिक्षा- बीएससी, एम.ए.(हिंदी) सचिव - महिला काव्य मंच फरीदाबाद इकाई संपादक - 'कालसाक्षी ' वेबपत्र पोर्टल विशेष - विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित ------ विस्तृत हूँ मैं नभ के जैसी, नभ को छूना पर बाकी है। काव्यसाधना की मैं प्यासी, काव्य कलम मेरी साकी है। मैं उड़ेल दूँ भाव सभी अरु, काव्य पियाला छलका जाऊँ। पीते पीते होश न खोना, सत्य अगर मैं दिखला पाऊँ। छ्न्द बहर अरकान सभी ये, रखती हूँ अपने तरकश में। किन्तु नही मैं रह पाती हूँ, सृजन करे कुछ अपने वश में। शब्द साधना कर लेखन में, बात हृदय की कह जाती हूँ। काव्य सहोदर काव्य मित्र है, अतः कवित्त दोहराती हूँ। ...... *अनहद गुंजन*