कविता

श्रवण कुमार कल और आज

इस चित्र को मैने दो भागों में विभाजित किया है, अपनी रचना के माध्यम से यह जानने की कोशिश की है कि जब यह पुनीत कार्य किया गया तब लोग क्या सोचते थे, आज यही दृश्य सामने आए तो लोग क्या कहेंगे –
साथ ही साथ श्रवण के मन में क्या भाव होंगे लिखने की कोशिश की है।
पहले लोगों के द्वारा किया गया विचार. – – – –
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बालक सुकुमार दण्ड तराजू की थाम,
पलड़े में मात-पिता को बिठाय जात धाम।
साहस अदम्य इसके, बच के चलत घाम,
तीनों हर्षित चले, जपते प्रभू का नाम।
विधि के विधान को करके श्रवण प्रणाम,
मातु-पितु तुला बिठा, चला देखो निष्काम।।
आज के लोग क्या कहेंगे. –
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बालक पर अत्याचार, करती है सरकार,
गरीबों की आह भला कैसे खाली जायेगी।
नेता मैं विपक्ष का, करता हूँ जन ऐलान,
मेरी सरकार बने दशा मैं सुधारुँगा।
मोटर मिलेगी, सब यात्रा को जाएगें,
चारो धाम करवाके भोज करवाऊँगा।
तोड़ दो निकम्मी इस सरकार के घमंड को,
मै ही मैं हूँ दूजा नहीं है कोई, मैं भव से पार करवाऊँगा।
देना वोट मुझको, किसी के लोभ में न फंसो,
कोई नहीं आपका, बस मैं ही काम आऊँगा।।
इन दोनों परिस्थिति में श्रवण सिर्फ और सिर्फ एक ही बात सोचता है – – –
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प्रभु लाता मैं द्वार तिहारे, अपने माता-पिता को,
तेरे दर्शन को नैन नहीं, यह दर्द दिखता आपको।
जब जन्म दुबारा देना, नैनो के साथ ही देना,
दुःख झेले, बहुत ही नाम जपे, हर लेना तुम श्राप को।।
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।।प्रदीप कुमार तिवारी।।
करौंदी कला, सुलतानपुर
7537807761

प्रदीप कुमार तिवारी

नाम - प्रदीप कुमार तिवारी। पिता का नाम - श्री दिनेश कुमार तिवारी। माता का नाम - श्रीमती आशा देवी। जन्म स्थान - दलापुर, इलाहाबाद, उत्तर-प्रदेश। शिक्षा - संस्कृत से एम ए। विवाह- 10 जून 2015 में "दीपशिखा से मूल निवासी - करौंदी कला, शुकुलपुर, कादीपुर, सुलतानपुर, उत्तर-प्रदेश। इलाहाबाद मे जन्म हुआ, प्रारम्भिक जीवन नानी के साथ बीता, दसवीं से अपने घर करौंदी कला आ गया, पण्डित श्रीपति मिश्रा महाविद्यालय से स्नातक और संत तुलसीदास महाविद्यालय बरवारीपुर से स्नत्कोतर की शिक्षा प्राप्त की, बचपन से ही साहित्य के प्रति विशेष लगव रहा है। समाज के सभी पहलू पर लिखने की बराबर कोशिस की है। पर देश प्रेम मेरा प्रिय विषय है मैं बेधड़क अपने विचार व्यक्त करता हूं- *शब्द संचयन मेरा पीड़ादायक होगा, पर सुनो सत्य का ही परिचायक होगा।।* और भ्रष्टाचार पर भी अपने विचार साझा करता हूं- *मैं शब्दों से अंगार उड़ाने निकला हूं, जन जन में एहसास जगाने निकला हूं। लूटने वालों को हम उठा-उठा कर पटकें, कर सकते सब ऐसा विश्वास जगाने निकला हूं।।* दो साझा पुस्तके जिसमे से एक "काव्य अंकुर" दूसरी "शुभमस्तु-5" प्रकाशित हुई हैं