कविता

विकास पुरूष

शब्दों के कोलाहल में जो, अंतर्मन की बात करे,
बाहर से बहरे गूंगे बन, अंतर्मन से संवाद करे।
प्रतिभाओं को आगे लाकर, विकास का प्रणेता है,
दर्द छुपाकर दिल में खुद का, बस भारत की बात करे।
जुगनू बन तम को हरता, निज प्रयासों से विश्व समरसता,
धरा गगन के कैनवास पर, आतंक पर प्रहार करे।
स्वाभिमान का नारा देकर, जिसने राष्ट्र का मान बढाया,
विकसित देश का सपना मोदी, विश्व गुरू सा काम करे।
— डॉ अ कीर्तिवर्धन