कविता

ऐ मालिक इंसान पर रहम कर उस पर इतनी मार क्यों है?

समय कितना खराब हो गया है?
वक़्त कितना बदल गया है?
बदले-बदले से हालात को देखकर
जीवन एक तमाशा हो गया है।
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
उस पर इतनी मार क्यों है?
कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
सांसों का भी यहां कत्ल होगा।
फिजा में आज जहर घुला है।
दुनिया में कितना हा-हाकार मचा है।
हर इंसान आज कितना बेबस
और लाचार हुआ है?
कल तक थे जो खयालात
आज बदले-बदले क्यों है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
उस पर इतनी मार क्यों है?
जिसने कितनी सुंदर दुनिया बनाई है।
वो ही आज इतना नाराज क्यों है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
 उस पर इतनी मार क्यों है?
तू ही एक सहारा था वही आज
कहां खो हो गया है?
जो अजीज थे हमारे वे पराए हो गए।
हम कुछ भी नहीं कर सके सिर्फ
 देखते ही रह गए।
क्या सच में यही कयामत है?
कल तक जो जितना सस्ता था।
वही आज इतना महंगा क्यों है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
उस पर इतनी मार क्यों है?
उजड़ती जा रही है बस्ती तेरी।
मौतें आज इतनी सस्ती क्यों है?
एक घर को घर बनाने में
कितनी पीढ़ियां खप जाती है।
खुदा आज इन पर तरस क्यों नहीं खाता?
जिंदगियां मिटाने-बचाने में।
हर कोई तेरी दुनिया में हंसना-जीना चाहता है।
तेरी बगिया को तू ही क्यों लूटना चाहता है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
उस पर इतनी मार क्यों है?
विश्वास पर दुनिया कायम थी पर आज
 उसी को जलाकर खाक करता क्यों है?
तू ही खुशियों के महका देता है फूल।
डर का आज इतना खोफ क्यों है?
जो आता है वह जरूर जाता है।
बेमौत बगिया लूटता क्यों है?
भांति-भाती के फूल हैं यहां।
खुशबू की सौगात है यहां।
पर एक साथ बुलाने का तेरा इरादा क्या है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर
उस पर इतनी मार क्यों है?
जिंदगी के सफर को कोई पहचाना नहीं,
फिर भी जिंदगी से कितना प्यार है!
 जिसका कोई ठिकाना नहीं।
मौत के रास्ते भी अनेक हैं।
अब ये रास्ते इतने सस्ते क्यों है?
हिम्मत ही जीने का अब सहारा है।
पर किस्मत के दरवाजे पर पहरा क्यों है?
इस भयानक मंजर का अंत भी जरुर होगा।
पर हर इंसान का अरमान बेगाना क्यों है?
ऐ मालिक इंसान पर रहम कर,
उस पर इतनी कहर क्यों है?
— डॉ.कान्ति लाल यादव

डॉ. कांति लाल यादव

सहायक प्रोफेसर (हिन्दी) माधव विश्वविद्यालय आबू रोड पता : मकान नंबर 12 , गली नंबर 2, माली कॉलोनी ,उदयपुर (राज.)313001 मोबाइल नंबर 8955560773