कविता

पूस की रात

कैसी ये ठंडक है आया
गरमी की ताप को भगाया
सूरज भी अब है अलसाया
ठंडक ने रोद्र रूप दिखलाया
गरमी की तपिश कमजोर आई
ठंडक ने शबनम तृण पे जमाई
रात काली अंधियारी     लगता
तिमिर की चादर जग में बिछता
चॉद गगन में खिल कर हँसती
देख रही है मानव की ये बस्ती
श्वान रात में सो नहीं है पाया
पिल्ले को भी रात    जगाया
वन प्राणी भी दिखे बेसहारा
प्रकृति ने ये कैसा रंग है सारा
पंक्षी घोंसले में चूजा संग चिपटा
डैने में है उनको साथ   पकड़ता
कैसी ठंडक पूस है ये  लाई
सिमट गये हैं सब लेकर रजाई
अगहन पुस का छोटा दिन आया
रात बड़ी हो  जोर आजमाया
प्रकृति का ये अनमोल खजाना
गरमी भगा कर ठंडक को बुलाना

— उदय किशोर साह

उदय किशोर साह

पत्रकार, दैनिक भास्कर जयपुर बाँका मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार मो.-9546115088