गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मन -उपवन में फैली खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
खिले -खिले यौवन की खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
भीनी भीनी गंध लुटाता सुर्ख लजाता सुंदर मुखड़ा
ग़ज़लों जैसी प्यारी खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
ताना -बाना भरनी पूनी इन्द्रधनुष सी छटा सलोनी
सपनों में जो आती खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
बच्चों, कमरों, दीवारों संग हंसना रोना और चहकना
पूरे घर में बसती खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
घोर यातना संघर्षों में लड़ते टूटे सपने और मुकद्दर
तन्हाई में है जो खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
स्मृतियों के वातायन में प्रतिबिम्बित होता रहता है
रूप सुनहरा देता खुशबू उस खुशबू को प्यार मुबारक।
— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

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