कवितापद्य साहित्यबाल कविता

लौटा दो मेरा बचपन।

बीते हुए वक्त में वापस, पुनः भेज दो हे! भगवन

धन दौलत की चाह नहीं,बस लौटा दो मेरा बचपन।

खेल-कूद मिट्टी में करना, पगडंडी पर आगे चलना

छुपम छुपाई गिल्ली डंडे, खेल खेल में खूब झगड़ना।

बात बात पर दोस्त मनाते, होने पर कोई अनमन

धन दौलत की चाह नहीं,बस लौटा दो मेरा बचपन।

 

बचपन छूटा आई जवानी, बैलों की सी है जिंदगानी

काम काज में भटक रहे हैं,खतम हो गयी है मनमानी।

निज बच्चों का शहरी बचपन,कैद हो गया फ्लैटों में

नहीं समझते गांव में क्या है, क्या होता है खेतों में।

बचपन की यादें रूला रहीं, काटता मुझे ये सूनापन

धन दौलत की चाह नहीं, बस लौटा दो मेरा बचपन।

 

 

प्रदीप शर्मा

आगरा, उत्तर प्रदेश