कविता

हादसों की गरमी से

हादसों की गरमी से – पिघल जाती है ज़िनदगी इन्सानों की

बहुत बरसता है जब पानी – बैठ जाति है मिट्टी ज़मीनों की

पहरे अच्छे नही होते – रूह से जुडे ज़िन्दगी के रिश्तों पर

शान्त रहने ही दिया जाने चाहिये – इन्हें जैसे गहराई झीलों की

परों के खुलते ही – परव़ाज़ भर लेते हैं परिन्दे फज़ा में

बैठकर ज़मीन पर व़ोह – देखते नही ऊंचाई आसमानों की

शहनियां बे शक हों – निशानियां खुशियों की ज़िन्दगी में

मगर धुनें अैसी भी हैं – सुनाती हैं जो कहानियां ग़मों की

गुज़रते हैं जब व़ोह चमन से – पलट कर अपने नक़ाब को

तितलियां भी रोने लगती हैं – देख कर मुरझाई सूरत फूलों की

जफाओं के ज़ख्म तो कभी भी – नही भरते ज़िन्दगी में

अेक के चुप होते ही – कराहटें सुनने लगती हैं दूसरों की

फैंका किया करते थे कभी लोग – नेकी कर के दरया में मदन

लेकिन आज तो नेकी खुद – घबरा रही है देखकर बुराई लोगों की

मोहब्बत से आव़ाज़ दे कर – बुला लो तुम अपने दुश्मनों को

दोस्ती हो जाती है और भी पुख्ता – मिसाल से अच्छे सलीकों की

मदन लाल

Cdr. Madan Lal Sehmbi NM. VSM. IN (Retd) I retired from INDIAN NAVY in year 1983 after 32 years as COMMANDER. I have not learned HINDI in school. During the years I learned on my own and polished in last 18 months on my own without ant help when demand to write in HINDI grew from from my readers. Earlier I used to write in Romanised English , I therefore make mistakes which I am correcting on daily basis.. Similarly Computor I have learned all by my self. 10 years back when I finally quit ENGINEERING I was a very good Engineer. I I purchased A laptop & started making blunders and so on. Today I know what I know. I have been now writing in HINDI from SEPTEMBER 2019 on every day on FACEBOOK with repitition I write in URDU in my note books Four note books full C 403, Siddhi Apts. Vasant Nagari 2, Vasai (E) 401208 Contact no. +919890132570