जीवन के कई रूप देखे हैं
जितने बसंत हमने देखे हैं,
उतने पतझड़ भी देखे हैं।
नयनों में सपने पलते देखे,
पल पल टूटते भी देखे हैं ।
हमने जीवन हँसते देखे हैं,
देखी हैं जीवन अर्थी भी ।
जीवन प्रेम के दरिया देखे,
नफरत के सागर भी देखे हैं।
देखा रिश्तों को बंधते बंधन,
उन्हें बिखरते भी देखे हैं।
जीना मुश्किल है दुनिया में,
गिरते तरू पनपते भी देखे हैं।
जिनको आश्रय छांव दिया ,
धूप उन्हें ही देते देखे हैं।
जीवन भर आँसू पोछें जिनके,
दर्द उन्हें ही देते देखे हैं ।
स्वार्थ भरी रिश्तों की गठरी ,
है खुली गांठ रंगत देखे हैं।
संग अपने हमराह को हमने
हर पल मरते जीते देखे हैं।
दुनियादारी माया के चक्कर
हर वक्त उलझे मानव देखे हैं।
‘शिव’ मन को दु:खी न कर तू ,
जीवन के कई रूप देखे हैं।
— शिवनन्दन सिंह
