तू चकवा मैं चकोरी तेरी
तू चकवा मैं चकोरी तेरी,
तेरे सिवाय मेरा कोई नहीं,
प्रीत अमर है हमारी-तुम्हारी,
रात भर फिर मैं क्यों सोई नहीं!
दूर नहीं, हम पास-पास होते,
फिर भी मिल क्यों नहीं पाते,
कैसी ये प्रीत की रीत निराली,
रहते हम गीत विरह के गाते!
विरह-मिलन का अनूठा संगम,
तेरी-मेरी अनूठी प्रेम कहानी
जीवन-पीर की है यही सच्चाई,
साहित्य ने हमारी पीर न जानी!
दुनिया दिन में मगन है रहती,
रात में सोती नींद चैन की,
श्रापित हैं शायद हम दोनों,
सजा मिली बैन-रहित रैन की।
शुक्र है दिन में तो हम मिल पाते,
विरह रैन का हम सह लेंगे,
एक वृक्ष पर आमने-सामने तो हैं,
कहना जो दिवस-मिलन में कह लेंगे!
— लीला तिवानी
