कविता

तू चकवा मैं चकोरी तेरी

तू चकवा मैं चकोरी तेरी,
तेरे सिवाय मेरा कोई नहीं,
प्रीत अमर है हमारी-तुम्हारी,
रात भर फिर मैं क्यों सोई नहीं!

दूर नहीं, हम पास-पास होते,
फिर भी मिल क्यों नहीं पाते,
कैसी ये प्रीत की रीत निराली,
रहते हम गीत विरह के गाते!

विरह-मिलन का अनूठा संगम,
तेरी-मेरी अनूठी प्रेम कहानी
जीवन-पीर की है यही सच्चाई,
साहित्य ने हमारी पीर न जानी!

दुनिया दिन में मगन है रहती,
रात में सोती नींद चैन की,
श्रापित हैं शायद हम दोनों,
सजा मिली बैन-रहित रैन की।

शुक्र है दिन में तो हम मिल पाते,
विरह रैन का हम सह लेंगे,
एक वृक्ष पर आमने-सामने तो हैं,
कहना जो दिवस-मिलन में कह लेंगे!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244