गीतिका – बचपन
चंचल चपल चुलबुला बचपन।
दिखलाता है कितने ठनगन।।
खेल खेलना लगता उत्तम,
बचपन से जीवन हो शोभन।
अम्मा दादी लाड़ लड़ाएँ,
बाबा कहें पौत्र जीवन-धन।
गिल्ली -डंडा गेंद कबड्डी,
कभी बनाते किरकिट के रन।
गली-गली में धूम मचाते,
बाग-बगीचा घूमें वन-वन।
कहें पिताजी पढ़ लो बेटे,
पढ़ने में पर लगे नहीं मन।
‘शुभम्’ सुनहरे दिन जीवन के,
चकरी-सा फिरता है घन -घन।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’
