ग़ज़ल
तुम से दूर जाते ही अश्कबार हो जाना,
ये है मेरी आंखों का इश्तिहार हो जाना।
इसमें ख़तरा है बेशक फिर भी अच्छा लगता है,
इस क़दर किसी पर ये ऐतिबार हो जाना।
सिर्फ़ उसकी मेहनत का ये हसीं नतीजा है,
ज़िन्दगी से दोबारा मुझको प्यार हो जाना।
ये शजर ज़मीं पर अब तुख़्म भी गिराता है,
ये है एक से इसका अब हज़ार हो जाना।
कोई उस तरफ़ से गर आपको सदा दे तो,
तुम शिकस्ता कश्ती पर भी सवार हो जाना।
यूं तो तेरे अपने ही ग़म बहुत सही बेशक,
फिर भी तू ज़माने का ग़मगुसार हो जाना।
बारहा ये लगता है उसके क़दमों में रख दे,
ये है मेरी जां का ही मुझ पे बार हो जाना।
इसको ही अरुन साहिब सच्चा प्यार कहते हैं,
बेवफ़ा के ग़म से भी बेक़रार हो जाना।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी।
