गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुम से दूर जाते ही अश्कबार हो जाना,
ये है मेरी आंखों का इश्तिहार हो जाना।

इसमें ख़तरा है बेशक फिर भी अच्छा लगता है,
इस क़दर किसी पर ये ऐतिबार हो जाना।

सिर्फ़ उसकी मेहनत का ये हसीं नतीजा है,
ज़िन्दगी से दोबारा मुझको प्यार हो जाना।

ये शजर ज़मीं पर अब तुख़्म भी गिराता है,
ये है एक से इसका अब हज़ार हो जाना।

कोई उस तरफ़ से गर आपको सदा दे तो,
तुम शिकस्ता कश्ती पर भी सवार हो जाना।

यूं तो तेरे अपने ही ग़म बहुत सही बेशक,
फिर भी तू ज़माने का ग़मगुसार हो जाना।

बारहा ये लगता है उसके क़दमों में रख दे,
ये है मेरी जां का ही मुझ पे बार हो जाना।

इसको ही अरुन साहिब सच्चा प्यार कहते हैं,
बेवफ़ा के ग़म से भी बेक़रार हो जाना।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी।

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।