कविता

कुछ सतरंगी ख्वाब

कुछ सतरंगी ख्वाब चुनकर लाया हूँ,
दिल अपना तेरे लिए लेकर आया हूँ।
कहीं तुम ठुकरा ना दो ये गुलाब मेरा,
बस यूँ मन ही मन में बहुत घबराया हूँ।

ये सुर्ख लाल गुलाब दे रहा गवाही है,
तूने दिल में मेरे मचाई बहुत तबाही है।
खुशबू बनकर रूह में समा गई हो तुम,
कहा ना हाल ए दिल ये लापरवाही है।

दुःख की धूप हो या खुशियों की छाँव,
तेरे साथ चलने में दर्द नहीं करेंगे पाँव।
थाम लो हाथ मेरा, ले लो लाल गुलाब,
आओ मिलकर बसाएं हम प्रेम गाँव।

इजहार ए मोहब्बत करने में कतराती हो,
खामोश रहकर आँखों से कह जाती हो।
“विकास” बनकर साया साथ निभाएगा,
जानती हो तुम, फिर भी उसे सताती हो।

— डॉ. विकास शर्मा

डॉ. विकास शर्मा

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