मुक्तक/दोहा

डॉ. सत्यवान सौरभ के चर्चित दोहे

आज तुम्हारे ढोल से, गूँज रहा आकाश।
बदलेगी सरकार कल, होगा पर्दाफाश॥

छुपकर बैठे भेड़िये, लगा रहे हैं दाँव।
बच पाए कैसे सखी, अब भेड़ों का गाँव॥

नफरत के इस दौर में, कैसे पनपे प्यार।
ज्ञानी-पंडित-मौलवी, करते जब तकरार॥

नई सदी ने खो दिए, जीवन के विन्यास।
सांस-सांस में त्रास है, घायल है विश्वास॥

जिनकी पहली सोच ही, लूट, नफ़ा श्रीमान।
पाओगे क्या सोचिये, चुनकर उसे प्रधान॥

कर्ज गरीबों का घटा, कहे भले सरकार।
सौरभ के खाते रही, बाक़ी वही उधार॥

लोकतंत्र अब रो रहा, देख बुरे हालात।
संसद में चलने लगे, थप्पड़-घूसे, लात॥

मूक हुई किलकारियाँ, गुम बच्चों की रेल।
गूगल में अब खो गये, बचपन के सब खेल॥

स्याही, कलम, दवात से, सजने थे जो हाथ।
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ॥

चीरहरण को देखकर, दरबारी सब मौन।
प्रश्न करे अँधराज पर, विदुर बने वह कौन॥

सूनी बगिया देखकर, तितली है खामोश।
जुगनू की बारात से, गायब है अब जोश॥

अंधे साक्षी हैं बनें, गूंगे करें बयान।
बहरे थामें न्याय की, ‘सौरभ’ आज कमान॥

अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।
बूढा पीपल है कहाँ, गई कहाँ चौपाल॥

गलियाँ सभी उदास हैं, पनघट हैं सब मौन।
शहर गए उस गाँव को, वापस लाये कौन॥

पद-पैसे की आड़ में, बिकने लगा विधान।
राजनीति में घुस गए, अपराधी-शैतान॥

नई सदी में आ रहा, ये कैसा बदलाव।
संगी-साथी दे रहे, दिल को गहरे घाव॥

जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार।
खतरे में ‘सौरभ’ दिखे, जाना सागर पार॥

हत्या-चोरी लूट से, कांपे रोज़ समाज।
रक्त रंगे अख़बार हम, देख रहे हैं आज॥

योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार।
अबलाएँ मठ लोक से, रह-रह करे पुकार॥

दफ्तर, थाने, कोर्ट सब, देते उनका साथ।
नियम-कायदे भूलकर, गर्म करे जो हाथ॥

मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार।
सभी बाँटकर ले रहे, पुरस्कार हर बार॥

कौन पूछता योग्यता, तिकड़म है आधार।
कौवे मोती चुन रहे, हंस हुये बेकार॥

कदम-कदम पर हैं खड़े, लपलप करे सियार।
जाये तो जाये कहाँ, हर बेटी लाचार॥

बची कहाँ है आजकल, लाज-धर्म की डोर।
पल-पल लुटती बेटियाँ, कैसा कलयुग घोर॥

राम राज के नाम पर, कैसे हुए सुधार।
घर-घर दुःशासन खड़े, रावण है हर द्वार॥

वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव।
माली बाग़ उजाड़ते, मांझी खोये नाव॥

घर-घर में रावण हुए, चौराहे पर कंस।
बहू-बेटियाँ झेलती, नित शैतानी दंश॥

वही खड़ी है द्रौपदी और बढ़ी है पीर।
दरबारी सब मूक है, कौन बचाये चीर॥

गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार।
धृतराष्ट्रों के सामने, गई व्यवस्था हार॥

अभिजातों के हो जहाँ, लिखे सभी अध्याय।
बोलो सौऱभ है कहाँ, वह सामाजिक न्याय॥

पीड़ित पीड़ा में रहे, अपराधी हो माफ़।
घिसती टाँगे न्याय बिन, कहाँ मिले इन्साफ॥

न्यायालय में पग घिसे, खिसके तिथियाँ वार।
केस न्याय का यूं चले, ज्यों लकवे की मार॥

फीके-फीके हो गए, जंगल के सब खेल।
हरियाली को रौंदती, गुजरी जब से रेल॥

बदले आज मुहावरे, बदल गए सब खेल।
सांप-नेवले कर रहे, आपस में अब मेल॥

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन।
घेरे घोर उदासियाँ, सुनता उसकी कौन॥

चूस रहे मजलूम को, मिलकर पुलिस-वकील।
हाकिम भी सुनते नहीं, सच की सही अपील॥

फ्रैंड लिस्ट में हैं जुड़े, सबके दोस्त हज़ार।
मगर पड़ोसी से नहीं, पहले जैसा प्यार॥

सौरभ ख़ूब अजीब है, रिश्तों का संसार।
अपने ही लटका रहें, गर्दन पर तलवार॥

अब तो आये रोज़ ही, टूट रहे परिवार।
फूट-कलह ने खींच दी, आँगन में दीवार॥

कब तक महकेगी यहाँ, ऐसे सदा बहार।
माली ही जब लूटते, कलियों का संसार॥

ये भी कैसा प्यार है, ये कैसी है रीत।
खाया उस थाली करें, छेद आज के मीत॥

बना दिखावा प्यार अब, लेती हवस उफान।
राधा के तन पर लगा, है मोहन का ध्यान॥

प्यार वासनामय हुआ, टूट गए अनुबंध।
बिखरे-बिखरे से लगे, अब मीरा के छंद॥

बगिया सूखी प्रेम की, मुरझाया है स्नेह।
रिश्तों में अब तप नहीं, कैसे बरसे मेह॥

बैठक अब ख़ामोश है, आँगन हुआ उजाड़।
बँटी समूची खिड़कियाँ, दरवाजे दो फाड़॥

कब गीता ने ये कहा, बोली कहाँ कुरान।
करो धर्म के नाम पर, धरती लहूलुहान॥

गैया हिन्दू हो गई, औ’ बकरा इस्लाम।
पशुओं के भी हो गए, जाति-धर्म से नाम॥

आधा भूखा है मरे, आधा ले पकवान।
एक देश में देखिये, दो-दो हिन्दुस्तान॥

कैसी ये सरकार है, कैसे हैं कानून।
करता नित ही झूठ है, सच्चाई का खून॥

बदले सुर में गा रहे, अब शादी के ढोल।
दूल्हा कितने में बिका, पूछ रहे हैं मोल॥

— डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh