पर्यावरण

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक बहुमंजिला मिट्टी के घर

आधुनिक दुनिया में विकास का अर्थ प्रायः ऊँची-ऊँची कंक्रीट और स्टील की इमारतों से जोड़ा जाता है। शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है और निर्माण उद्योग पृथ्वी के सबसे अधिक ऊर्जा खपत करने वाले क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। सीमेंट, स्टील और कांच आधारित निर्माण न केवल महंगे हैं, बल्कि भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन भी करते हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और प्रदूषण के इस दौर में अब दुनिया फिर से पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण तकनीकों की ओर देखने लगी है। इसी संदर्भ में मिट्टी आधारित बहुमंजिला भवनों की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण बनती जा रही है। यमन का ऐतिहासिक शहर Shibam इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है, जो यह सिद्ध करता है कि मिट्टी केवल साधारण ग्रामीण घरों की सामग्री नहीं, बल्कि बहुमंजिला शहरी वास्तुकला का भी आधार बन सकती है।

शिबाम को “रेगिस्तान का मैनहैटन” कहा जाता है। यह शहर लगभग सोलहवीं शताब्दी में विकसित हुआ और यहाँ मिट्टी की पाँच से ग्यारह मंजिल तक ऊँची इमारतें बनाई गईं। ये भवन सूर्य में सुखाई गई मिट्टी की ईंटों से निर्मित हैं और सदियों बाद भी आज अस्तित्व में हैं। यह तथ्य आधुनिक सोच को चुनौती देता है, क्योंकि सामान्यतः मिट्टी के घरों को अस्थायी और कमजोर माना जाता है। वास्तव में शिबाम यह सिद्ध करता है कि स्थानीय सामग्री और पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके अत्यंत उन्नत और घनी शहरी संरचनाएँ विकसित की जा सकती हैं।

शिबाम की वास्तुकला केवल ऊँची इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। संकरी गलियाँ, एक-दूसरे के निकट बने भवन और मोटी मिट्टी की दीवारें रेगिस्तानी गर्मी को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। मिट्टी की दीवारें दिन में गर्मी को धीरे-धीरे अवशोषित करती हैं और रात में उसे धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे भवनों के भीतर तापमान अपेक्षाकृत संतुलित बना रहता है। आज जब आधुनिक शहर अत्यधिक गर्मी और “अर्बन हीट आइलैंड” की समस्या से जूझ रहे हैं, तब शिबाम जैसी पारंपरिक वास्तुकला अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देती है।

मिट्टी आधारित बहुमंजिला भवनों का सबसे बड़ा लाभ पर्यावरणीय दृष्टि से है। आधुनिक निर्माण उद्योग वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत है। विशेष रूप से सीमेंट उद्योग भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता है। इसके विपरीत मिट्टी स्थानीय रूप से उपलब्ध होती है और उसके उपयोग में बहुत कम ऊर्जा लगती है। यदि स्थानीय मिट्टी, प्राकृतिक फाइबर और पारंपरिक तकनीकों का उपयोग किया जाए, तो निर्माण क्षेत्र के पर्यावरणीय प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। यही कारण है कि दुनिया में “अर्थ आर्किटेक्चर” अर्थात मिट्टी आधारित वास्तुकला की चर्चा फिर से बढ़ रही है।

आर्थिक दृष्टि से भी मिट्टी के बहुमंजिला घर लाभकारी हो सकते हैं। आधुनिक निर्माण सामग्री लगातार महंगी होती जा रही है। सीमेंट, स्टील और कांच आधारित भवन निर्माण सामान्य लोगों के लिए कठिन होता जा रहा है। इसके विपरीत मिट्टी अपेक्षाकृत सस्ती और स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री है। इससे निर्माण लागत कम हो सकती है और स्थानीय श्रमिकों व कारीगरों को रोजगार भी मिल सकता है। मिट्टी आधारित निर्माण स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है क्योंकि इसमें बाहरी औद्योगिक सामग्री पर निर्भरता कम होती है।

ऊर्जा बचत के संदर्भ में भी मिट्टी के घर अत्यंत उपयोगी हैं। आधुनिक कंक्रीट भवन गर्मियों में अत्यधिक गर्म हो जाते हैं, जिसके कारण एयर कंडीशनर का उपयोग बढ़ता है और बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ती है। मिट्टी के भवन प्राकृतिक रूप से ताप नियंत्रित करते हैं, जिससे कृत्रिम शीतलन की आवश्यकता कम होती है। यह न केवल बिजली बचाता है, बल्कि दीर्घकाल में आर्थिक रूप से भी लाभदायक सिद्ध होता है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ऊर्जा-कुशल भवनों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है और मिट्टी आधारित वास्तुकला इस दिशा में महत्वपूर्ण समाधान प्रदान कर सकती है।

भारत जैसे देश के लिए यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत में सदियों से मिट्टी आधारित निर्माण की समृद्ध परंपरा रही है। राजस्थान, कच्छ, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में मिट्टी के घर स्थानीय जलवायु के अनुसार बनाए जाते थे और वे अत्यंत आरामदायक माने जाते थे। किंतु आधुनिकता के प्रभाव में कंक्रीट आधारित निर्माण को ही विकास का प्रतीक मान लिया गया। परिणामस्वरूप शहर अधिक गर्म, प्रदूषित और ऊर्जा-निर्भर होते गए। अब आवश्यकता है कि पारंपरिक वास्तुकला और आधुनिक इंजीनियरिंग का संतुलित समन्वय किया जाए।

हालाँकि मिट्टी आधारित बहुमंजिला भवनों के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। अत्यधिक वर्षा, भूकंप, रखरखाव और आधुनिक शहरी नियम इनके विकास में बाधा बन सकते हैं। मिट्टी के भवनों को नियमित संरक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन आधुनिक तकनीक जैसे स्थिरीकृत मिट्टी ब्लॉक, रैम्ड अर्थ और प्राकृतिक फाइबर सुदृढ़ीकरण इन भवनों को अधिक मजबूत और टिकाऊ बना सकते हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि मिट्टी आधारित बहुमंजिला भवन आधुनिक युग में असंभव हैं।

वास्तव में शिबाम जैसे शहर यह संदेश देते हैं कि विकास का अर्थ केवल कंक्रीट और स्टील नहीं है। भविष्य की वास्तुकला को पर्यावरणीय संतुलन, ऊर्जा दक्षता और स्थानीय संसाधनों के आधार पर विकसित करना होगा। मिट्टी के बहुमंजिला घर केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के टिकाऊ और मानवीय शहरों की संभावित दिशा भी हो सकते हैं। इस दृष्टि से शिबाम मानव सभ्यता के लिए प्रेरणा का एक जीवित उदाहरण है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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