कोई तो ऐसी जगह
कोई तो ऐसी जगह हो
जहां थोड़ी सी सुकुन मयस्सर हो
दिनों में न सही , पलो में तो हो
जिंदगी गुलजार न सही
बेफिक्री थोड़ी तो हो
बहुत मुमकिन है आराम न हो
लेकिन राहत थोड़ी तो हो
भागते-भागते थक से गए है पांव मेरे
टहलने की भी गुंजाइश थोड़ी तो हो
कहने के लिए लाखो फसाने है मेरे पास
सुनने को कोई तो हो
जीतने की बहुत ख्वाहिश नहीं है मुझे
लेकिन हारने का हौसला भी तो हो।
— विभा कुमारी “नीरजा”
