ओलम (अनन्त प्रेम)
जी रहा हूँ जीवन
बड़ी ही शिद्दत से
क्या मेरी पीड़ा का
कारण बन तुम
मुझे शून्य करोगे ?
हारा तो कभी
था ही नहीं मैं
पर क्या छेड़
मेरे जज्बातों की तरंगों को
मुझे तुम अधूरा करोगे?
मानता हूं तुम्हें
भेजा है उस खुदा ने
स्वयं मेरे पास
क्या छेड़ प्रेम का राग
मुझे हीरा करोगे ?
— डॉ. राजीव डोगरा
