दोहा
आंगन में चुप चुप खड़ा,बूढ़ा पीपल पेड़।
कहे समय से क्या मिटा,मत किस्सा ये छेड़।।
नयी नस्ल बर्बाद है,खत्म हो गया प्यार।
भाई भाई के बीच है,नफरत की दीवार।।
छोटे बच्चे पी रहे,बीड़ी और शराब।
भूख गरीबी बढ़ गई,हालत बड़ी खराब।।
गाय भैंस सब बिक गई,खेत हुए नीलाम।
मालिक करने लग गये,मजदूरी का काम।।
गौरैया आती नहीं,अब पीपल के पास।
सभी खगो को खा गया,ये बेरहम विकास।।
ताल तलैया सूख कर,बढ़ा रहे हैं प्यास।
पीपल रोता देखकर,छिनता धरा लिबास।।
— शालिनी शर्मा
