शिक्षा एवं व्यवसाय

विश्व की श्रेष्ठ व्यवस्थाएँ और भारत की परीक्षा प्रणाली

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है। प्राकृतिक संसाधन, आर्थिक संपन्नता और सैन्य क्षमता किसी देश को कुछ समय तक सशक्त बना सकते हैं, लेकिन दीर्घकालीन विकास का आधार केवल शिक्षित, योग्य और चरित्रवान नागरिक ही होते हैं। यही कारण है कि विश्व के विकसित और प्रगतिशील राष्ट्र शिक्षा तथा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।

परीक्षा केवल अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह प्रतिभा, परिश्रम और अवसर के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है। जब कोई विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करके किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, तब वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए भी संघर्ष कर रहा होता है। ऐसे में यदि प्रश्नपत्र लीक हो जाए, परीक्षा निरस्त हो जाए अथवा भ्रष्टाचार के कारण चयन प्रक्रिया प्रभावित हो जाए, तो सबसे अधिक आघात उस विद्यार्थी को पहुँचता है जिसने ईमानदारी से परिश्रम किया है।

दुर्भाग्य से भारत में समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षाओं के निरस्त होने की घटनाएँ सामने आती रही हैं। लाखों विद्यार्थियों को पुनः परीक्षा देनी पड़ती है। अनेक अभ्यर्थी भारी आर्थिक और मानसिक बोझ उठाकर परीक्षा देते हैं, लेकिन कई बार परीक्षा रद्द होने से उनकी मेहनत व्यर्थ चली जाती है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास पर गंभीर आघात है।

चीन सहित विश्व के अनेक देशों के अनुभव हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि क्या हम अच्छी व्यवस्थाओं से सीखने के लिए तैयार हैं? भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन सदैव उदार और ज्ञानप्रधान रहा है। हमारे ऋषियों ने कहा है— “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” अर्थात संसार के सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार हमारे पास आएँ। यदि किसी देश ने शिक्षा, विज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यावरण अथवा प्रशासन के क्षेत्र में कोई प्रभावी व्यवस्था विकसित की है, तो उससे सीखना हमारी बौद्धिक परिपक्वता का परिचायक है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन श्रेष्ठ व्यवस्थाओं का सम्मान और उनका अनुकरण राष्ट्रहित में होना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत की परीक्षा प्रणाली को और अधिक सुरक्षित, तकनीकी रूप से सुदृढ़ तथा पारदर्शी बनाया जाए। प्रश्नपत्र निर्माण, मुद्रण, परिवहन और वितरण की संपूर्ण प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक का उपयोग हो। जिम्मेदार अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो और परीक्षा प्रक्रिया के प्रत्येक चरण की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि परीक्षा संबंधी अनियमितताओं का प्रभाव केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालता है। हाल ही में समाचार पत्रों के माध्यम से ऐसी जानकारी सामने आई कि एक छात्रा ने पुनः परीक्षा देने की आशंका और मानसिक दबाव के कारण आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठा लिया। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी परीक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है। चाहे घटना के सभी तथ्य जो भी हों, इतना निश्चित है कि बार-बार परीक्षाएँ निरस्त होना और पुनः परीक्षा की अनिश्चितता लाखों विद्यार्थियों पर असहनीय मानसिक दबाव उत्पन्न करती है।

हमें यह समझना होगा कि किसी प्रश्नपत्र के लीक होने की कीमत केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं चुकाती, बल्कि उसका बोझ उन विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है जिन्होंने दिन-रात मेहनत की होती है। उनके सपने, आत्मविश्वास, मानसिक संतुलन और कभी-कभी उनका जीवन तक प्रभावित हो जाता है। इसलिए परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और राष्ट्रीय दायित्व का विषय है।

विशेष रूप से प्रश्नपत्र लीक कराने वाले, परीक्षा प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने वाले तथा लाखों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कठोरतम कानूनी प्रावधान होने चाहिए। ऐसे अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की युवा शक्ति, प्रतिभा और भविष्य के साथ विश्वासघात हैं। जब एक प्रश्नपत्र लीक होता है, तब केवल परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों परिवारों की आशाएँ और वर्षों की मेहनत भी प्रभावित होती है। इसलिए ऐसे मामलों में त्वरित न्याय, कठोर दंड और पूर्ण पारदर्शिता समय की मांग है।

भारत की युवा शक्ति हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि हम उनके परिश्रम, प्रतिभा और सपनों की रक्षा नहीं कर पाए, तो विकास के हमारे सभी दावे अधूरे रह जाएंगे। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

समय आ गया है कि हम विश्व की श्रेष्ठ व्यवस्थाओं से सीखते हुए अपनी परीक्षा प्रणाली को ऐसा स्वरूप दें, जिसमें ईमानदार परिश्रम करने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता केवल उसकी योग्यता और मेहनत पर निर्भर करेगी, किसी अनियमितता या भ्रष्टाचार पर नहीं। यही एक सशक्त, न्यायपूर्ण और विकसित भारत की आधारशिला होगी। राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके युवा हैं, और उनके सपनों की रक्षा करना ही किसी भी संवेदनशील और उत्तरदायी व्यवस्था का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।

— राकेश चंद्र शुक्ला

राकेश चन्द्र शुक्ला

लेखक–संपादक, सामाजिक एवं पर्यावरण चिंतक मकान नंबर -7 ,सरयू धाम , कमला नगर आगरा-282005 उत्तर प्रदेश editor.sahakarsamvad@gmail.com M- +91 94127 22476