कविता

नाराज हूँ

नाराज़ हूँ,
पर मेरी नाराज़गी का
किसी को कोई फ़र्क
पड़ता भी है या नहीं,
ये सोचने की फुर्सत भी
कहाँ रही अब।
किससे कहूँ अपना शिकवा,
किसे सुनाऊँ मन की थकान,
खुद से ही अनजान बैठा हूँ,
जैसे भीड़ में खो गयी हो
मेरी पहचान।
टूट चुका है भरोसा
दिखावे से भरे जगत पर,
जहाँ रिश्ते तो रहते हैं साथ,
पर एहसास अक्सर
छूट जाते हैं सफ़र में।
हालात स्वभाव बदल देते हैं,
पर इंसान तो वही रहता है,
फिर क्यों किसी के होने
या न होने से अब किसी को
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है?
एक उम्मीद ज़िंदा रहती है,
कि कभी तो कोई पूछेगा—
“आप चुप क्यों हैं?”
कभी तो किसी को हमारी
नाराज़गी में भी छिपा हुआ
प्यार दिखाई देगा।
क्योंकि सच तो यह है कि
नाराज़ वही होता है
जिसे अब भी अपनापन होने की
उम्मीद होती है,
वरना बेगानों से कोई
शिकायत नहीं करता।
नाराज़गी में भी छिपा
अनकहा प्यार होता है,
हर ख़ामोशी के पीछे कोई
इंतज़ार होता है।
जो रिश्ते दिल के
सबसे क़रीब होते हैं अक्सर,
शिकवा भी उन्हीं से
और उन्हीं पर ऐतबार होता है।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com

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