मानवीय संवेदनाएँ
मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,
कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।
क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,
कि इंसानियत का मूल्य ही खो गया है?
ज़िंदगी तो बहुत छोटी होती है,
क्या कोई धन साथ लेकर जाता है?
क्यों नहीं सोचते लोग यह बात,
केवल कर्म ही अंत तक साथ निभाता है।
उन मासूमों का क्या दोष था,
जो असमय काल के गाल में समा गए।
उन माताओं का क्या हाल होगा,
जिनकी गोद हमेशा के लिए उजड़ गई।
आँखों के आँसू अभी सूखे भी नहीं,
पर कुछ समय बाद लोग सब भूल जाएंगे।
फिर होगा कोई और हादसा,
और हम केवल शोक मनाते रह जाएंगे।
क्या प्रशासन फिर भी नहीं जागेगा?
क्या वह केवल अपनी जेबें भरता रहेगा?
जिस दिन किसी बड़े व्यक्ति का अपना दुख होगा,
शायद तभी वह इस पीड़ा को समझ पाएगा।
— गरिमा लखनवी
