प्रकृति के महिमागान का महापर्व है हरियाली अमावस्या
वर्षा की फुहारों से नहायी धरती, हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ियाँ, कल-कल बहते नदी-नाले, पेड़-पौधों पर पसरी नवजीवन की आभा और वातावरण में घुली मिट्टी की सोंधी सुगंध, प्रकृति जब अपने सर्वाधिक मनोहारी रूप में होती है, तब भारतीय लोकजीवन उसे केवल निहारता नहीं, बल्कि उसके साथ उत्सव मनाता है। हरियाली अमावस्या इसी प्रकृति-प्रेम, प्रकृति-वंदन और सामूहिक उल्लास का अनुपम पर्व है।
भारत की उत्सवी परम्परा में अनेक पर्व ऐसे हैं जिनमें मनुष्य और प्रकृति के बीच आत्मीय सम्बन्ध का सहज दर्शन होता है। हरियाली अमावस्या उन्हीं पर्वों में से एक है। वर्षा ऋतु के मध्य आने वाला यह पर्व मानो तपती गर्मी के बाद धरती को मिले जीवनदायी जल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। प्रकृति की हरियाली के साथ मनुष्य का मन भी हरा-भरा हो उठता है और तन-मन से लेकर परिवेश तक सुकून का महाप्रपात झरने लगता है।
वागड़ अंचल की विशिष्ट लोक-संस्कृति में हरियाली अमावस्या को ‘दीवासा’ के नाम से विशेष पहचान प्राप्त है। यह केवल किसी तिथि का नाम नहीं, बल्कि वागड़ के लोकजीवन में प्रकृति, परम्परा, स्वाद, आस्था और सामूहिक आनंद का जीवंत प्रतीक है।
वागड़ के लोकजीवन में ‘दीवासा’
वाग्वर अंचल की उत्सवी परम्परा में ‘दीवासा’ का अपना विशिष्ट स्थान है। वर्षाकाल में सूर्य के दक्षिणायन होने और भारतीय धार्मिक परम्परा में भगवान के शयनकाल से जुड़े चातुर्मास के कारण मांगलिक आयोजनों में एक प्रकार का विराम आता है। ऐसे में वर्षा ऋतु के लोकपर्वों की श्रृंखला का एक महत्त्वपूर्ण उद्घाटन हरियाली अमावस्या से होता है।
वागड़ में इसे प्रकृति के नवजीवन के स्वागत के अवसर के रूप में देखा जाता रहा है। वर्षा के आगमन के साथ धरती का रूप बदलता है और हरियाली अमावस्या तक यह परिवर्तन अपने चरम सौन्दर्य की ओर बढ़ने लगता है। खेतों, पहाड़ियों, जंगलों और जलाशयों में जीवन की नई आहट सुनाई देती है। इसीलिए ‘दीवासा’ का उल्लास केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहताय वह परिवार, समाज और सम्पूर्ण परिवेश को अपने रंग में रंग देता है।
जब बांसवाड़ा कहलाता था ‘राजस्थान का चेरापूंजी’
आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना कठिन हो सकता है कि कभी बांसवाड़ा को ‘राजस्थान का चेरापूंजी’ कहा जाता था। एक समय यहां 75 इंच अथवा उससे भी अधिक वार्षिक वर्षा का उल्लेख मिलता है। लगातार पखवाड़ों और कई बार महीनों तक चलने वाली वर्षा से वागड़ की धरती का रूप उत्तराखण्ड की हरी-भरी वादियों जैसा दिखाई देता था।
बीहड़ वन, सघन जंगल, चारों ओर पसरी हरियाली, नदी-नालों का महीनों तक कल-कल प्रवाह और वन्यजीवों की स्वच्छंद अठखेलियाँ, वागड़ के उस नैसर्गिक वैभव की स्मृतियां आज भी बुजुर्गों की बातचीत में जीवित हैं।
समय के साथ जंगलों का विस्तार घटा, प्राकृतिक परिस्थितियां बदलीं और वर्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन आयाय लेकिन हरियाली अमावस्या आते-आते वागड़ की वसुंधरा आज भी अपने भीतर छिपे प्राकृतिक सौन्दर्य को पूरी शिद्दत से प्रकट करती है। पहाड़ियां हरी चादर ओढ़ लेती हैं, जलाशयों में पानी का विस्तार बढ़ता है और वनस्पतियों की नई कोपलें वातावरण में नवजीवन का संदेश देती हैं।
उल्लास और प्रकृति-अभिव्यक्ति का महापर्व
दीवासा वागड़वासियों के लिए प्रकृति के साथ संवाद का लोकोत्सव है। इस दिन मानो तन-मन से लेकर परिवेश और हवाओं तक में उल्लास की तरंगें दौड़ने लगती हैं। प्रकृति का सौन्दर्य केवल आंखों को ही नहीं भाता, बल्कि मन के भीतर तक उतरकर एक अद्भुत शांति और ताजगी का अनुभव कराता है।
यह पर्व इस बात का भी स्मरण कराता है कि मनुष्य प्रकृति से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। उसका जीवन जल, जंगल, जमीन, वनस्पति और ऋतुचक्र से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। भारतीय लोकपरम्पराओं ने इस सम्बन्ध को किसी आधुनिक पर्यावरणीय अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि सहज जीवन-पद्धति के रूप में सदियों पहले स्वीकार कर लिया था।
दीवासा की मिठास – लप्सी की परम्परा
वागड़ के घर-आंगन में पर्व का उल्लास पकवानों की सुगंध के साथ भी प्रकट होता है। हरियाली अमावस्या, अर्थात् दीवासा पर लप्सी बनाने की परम्परा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
वागड़ के लोकजीवन में लप्सी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि शुभारम्भ और मंगलभाव का प्रतीक है। गेहूं और गुड़ से बनने वाला यह पारम्परिक व्यंजन अपनी सादगी, स्वाद और आत्मीयता के कारण लोकजीवन में गहराई से रचा-बसा है। शुभ अवसरों पर लप्सी बनाए जाने की परम्परा आज भी अनेक घरों में जीवित है।
बरसात के मौसम में ठंडी हवाओं के बीच गरमागरम लप्सी का स्वाद इस पर्व की स्मृतियों को और अधिक आत्मीय बना देता है। बदलते समय के साथ मालपुए सहित अन्य पारम्परिक व्यंजनों का प्रचलन भी बढ़ा है, लेकिन लप्सी की सांस्कृतिक पहचान अब भी अपनी जगह कायम है।
राजदरबार से लोकमंगल तक
बुजुर्गों की स्मृतियों में वागड़ के दीवासा का एक और रोचक पक्ष सुरक्षित है। कहा जाता है कि रियासतकाल में हरियाली अमावस्या के अवसर पर बांसवाड़ा में राजदरबार लगता और दरीखाना भरता था। राजा से लेकर प्रजा तक प्रकृति के इस महोत्सव में सहभागी बनते थे।
यह परम्परा बताती है कि लोकपर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते। वे सामाजिक समरसता, सामूहिक सहभागिता और आनंद के ऐसे अवसर भी होते हैं जहां समाज के विभिन्न वर्ग एक साझा सांस्कृतिक अनुभूति से जुड़ते हैं।
प्रकृति के बीच ‘जंगल में मंगल’
हरियाली अमावस्या आते ही प्रकृति की गोद में कुछ समय बिताने की इच्छा प्रबल हो उठती है। वागड़ में इसका सबसे सुंदर रूप प्राकृतिक स्थलों पर दिखाई देता है। परिवार, मित्र और परिचित समूह बनाकर लोग जंगलों, पहाड़ियों, जलाशयों और मनोरम स्थलों की ओर निकलते हैं।
यह पिकनिक मात्र मनोरंजन नहीं होती। प्रकृति के बीच बिताया गया समय मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ता है। शहरों की भागदौड़, कृत्रिम जीवनशैली और निरन्तर बढ़ते तनाव के बीच हरियाली अमावस्या जैसे पर्व हमें प्रकृति के सान्निध्य में लौटने का अवसर देते हैं।
वागड़ के प्राकृतिक स्थलों पर इस दिन दिखाई देने वाला जनसमूह इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद मनुष्य के भीतर प्रकृति के प्रति आकर्षण आज भी उतना ही जीवंत है।
कल्पवृक्षों की परिक्रमा और आस्था
बांसवाड़ा में हरियाली अमावस्या के अवसर पर कल्पवृक्षों के दर्शन और पूजा की परम्परा भी विशेष आकर्षण का केन्द्र रहती है। बांसवाड़ा-रतलाम मार्ग पर बाईतालाब के समीप स्थित प्राचीन ‘राजा’ और ‘रानी’ नाम से प्रसिद्ध वृक्षों के प्रति स्थानीय जनमानस में गहरी आस्था है।
हरियाली अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालु इन वृक्षों की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं का स्मरण करते हुए परिक्रमा करते हैं। यह परम्परा अपने भीतर प्रकृति और आस्था के उस अद्भुत समन्वय को समेटे हुए है जिसमें वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहता, वह लोकविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक बन जाता है।
डूंगरपुर में भी हरियाली अमावस्या का अपना विशिष्ट उल्लास रहता है। गेपसागर की पाल, नानाभाई पार्क और फतहगढ़ी क्षेत्र में लगने वाले मेले इस पर्व को लोकमंगल और सामूहिक मनोरंजन का स्वरूप प्रदान करते रहे हैं।
हरियाली के रंग में रंगता नारी मन
हरियाली अमावस्या का एक मनोहारी पक्ष महिलाओं की सहभागिता में भी दिखाई देता है। प्रकृति के रंग में स्वयं को रंगने की लोकपरम्परा के अनुरूप महिलाएं इस अवसर पर हरे परिधानों को विशेष महत्त्व देती हैं।
हरे रंग का यह आकर्षण केवल श्रृंगार तक सीमित नहीं है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में हरा रंग जीवन, उर्वरता, नवांकुर, समृद्धि और प्रकृति का प्रतीक माना जाता रहा है। इसलिए हरियाली अमावस्या पर हरे परिधान धारण करना प्रकृति के साथ भावनात्मक एकात्मता की सहज अभिव्यक्ति भी है।
लोकजीवन में हरियाली का आवाहन
हरियाली अमावस्या वागड़ की वादियों में पर्यावरण-प्रेम का ऐसा लोकदृश्य उपस्थित करती है, जिसमें शहरों और कस्बों से लेकर गांवों, पहाड़ियों, पालों, फलों और ढाणियों तक उल्लास दिखाई देता है।
इस वर्ष हरियाली अमावस्या बुधवार, 12 अगस्त को पड़ रही है। पर्व की धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था के साथ बुधवार का संयोग भी स्थानीय जनमानस में विशेष उत्साह का विषय है। हालांकि किसी पर्व का वास्तविक महत्त्व केवल तिथि अथवा वार में नहीं, बल्कि उससे जुड़े सांस्कृतिक संदेश में निहित होता है।
हरियाली अमावस्या का सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता केवल एक दिन का भाव न रहे। वृक्ष, जल, मिट्टी, पहाड़ और वन्यजीवन हमारे अस्तित्व के आधार हैं। यदि लोकपर्वों की परम्पराओं को पर्यावरण संरक्षण की आधुनिक चेतना से जोड़ दिया जाए तो ये पर्व सामाजिक परिवर्तन के अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
श्यामपुरा से प्रकृति पर्यटन तक
बांसवाड़ा शहर के समीप स्थित श्यामपुरा का वन क्षेत्र कुछ वर्षों से प्रकृति-प्रेमियों और वन-विहार के इच्छुक लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना है। सघन वनस्पतियों और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर इस क्षेत्र में आमजन को प्रकृति के निकट लाने के उद्देश्य से वन विभाग द्वारा पूर्व में हरियाली अमावस्या के अवसर पर मेले का आयोजन भी किया गया था।
बांसवाड़ा नगर परिषद की ओर से कागदी क्षेत्र में होने वाले आयोजनों ने भी इस अवसर को स्थानीय जनजीवन से जोड़ने में भूमिका निभाई है। ऐसे आयोजन यदि प्रकृति संरक्षण, स्थानीय लोककला, पारम्परिक भोजन और पर्यावरण जागरूकता के साथ निरन्तर विकसित किए जाएं तो वागड़ को एक विशिष्ट प्रकृति एवं सांस्कृतिक पर्यटन क्षेत्र के रूप में नई पहचान मिल सकती है।
हरियाली अमावस्या – परम्परा से पर्यावरण चेतना तक
हरियाली अमावस्या की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह पर्व हमें किसी उपदेशात्मक भाषा में नहीं, बल्कि उत्सव के माध्यम से प्रकृति का महत्त्व समझाता है।
जब कोई परिवार हरियाली के बीच बैठकर भोजन करता है, जब बच्चे पेड़ों और पक्षियों को देखते हुए आनंदित होते हैं, जब महिलाएं हरे परिधान में प्रकृति के रंग से एकाकार होती हैं, जब श्रद्धालु कल्पवृक्ष के सामने सिर झुकाते हैं और जब पूरा समाज वर्षा से सजी धरती के सौन्दर्य का सामूहिक आनंद लेता है, तब अनायास ही मनुष्य और प्रकृति के बीच वह पुराना रिश्ता पुनर्जीवित हो उठता है, जिसे आधुनिक जीवनशैली ने कहीं पीछे छोड़ दिया है।
वागड़ का ‘दीवासा’ इसलिए केवल हरियाली का उत्सव नहीं है। यह धरती के प्रति कृतज्ञता, जल के प्रति सम्मान, वृक्षों के प्रति श्रद्धा और जीवन के प्रति उल्लास का पर्व है।
आज जब दुनिया पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, जल-संकट और तेजी से घटते हरित क्षेत्र को लेकर चिंतित है, तब भारतीय लोकपर्वों की पर्यावरणीय चेतना को नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। हरियाली अमावस्या इसी दिशा में लोकजीवन से निकला हुआ एक सशक्त संदेश है।
वागड़ की धरती पर जब सावन की हरियाली अपना सर्वाधिक मनोहारी रूप धारण करती है, तब दीवासा का पर्व मनुष्य को जैसे यह कहता है –
प्रकृति को केवल देखने के लिए नहीं,
उसके साथ जीने के लिए बचाइए।
क्योंकि हरियाली केवल पेड़ों पर नहीं होती,
हरियाली मन में भी उतरती है,
जीवन में भी उतरती है
और समाज में भी।
और यही वागड़ के ‘दीवासा’ का सबसे सुंदर, सबसे व्यापक और सबसे कालजयी संदेश है।
— डॉ. दीपक आचार्य
